गुरुवार, 27 अगस्त 2009

तो बदल डालो

पिछले पाँच सालों से निराश कार्यकर्ता और निराश हो चला है । उसकी चिंता बस इतनी है कि पार्टी बनी रहे । नेता तो आते जाते रहतें है पर संगठन बरक़रार रहता है। जिन्हें संगठन कि चिंता है वे बस यही देख रहें हैं कि भाजपा कहाँ जा रही है । ९० के दशक के बाद सत्ता का स्वाद चख कर भाजपा के नेता भी सुबिधाभोगी हो गएँ हैं । पिछले कई सालों से भाजपा में कार्यकर्ता ख़ुद को उपेक्षित महसूस कर रहें तभी तो बड़े नेताओं की आपसी खींच तान के बाद भी उनमे कोई सुगबुगाहट नहीं दिख रही । यह भाजपा के लिए एक अच्छी बात है। क्योकि वह यह जनता है कि नेता तो आते जाते रहते हैं पर संगठन एक बार ही बनता है। भाजपा में इस समय मचा बवाल बिना मतलब का है । अगर आप राजनीती में हैं तो इसमे हर और जीत तो लगी ही रहती है। हाँ एक बात तो जरूर है कि जब जीत का श्रेय किसी को दिया जाता है तो हर कि जिम्मेदारी भी तो किसी को लेनी ही चाहिए। लेकिन लगता है कि पार्टी के भीतर कि राजनीती पार्टी नेताओं के लिए इतनी अहम् हो गई है कि वे एक दूसरे को काटने के लिए किसी भी हद तक जा सकतें हैं । कुल मिला कर लगता है कि वाकई भाजपा को कांग्रेस कि तरह कामराज योजना की जरूरत है। लेकिन यह कम उसे कांग्रेस कि से थोड़ा हट कर करना होगा। सही यह होता कि वरिष्ठ नेता पार्टी में संरक्षक कि भूमिका में आकार नई पीढी के लिए रास्ता साफ करें । तभी भाजपा देश में सही मायने में दो ध्रुवीय राजनीती का एक मजबूत ध्रुव बन सकती है। इस लिए बल्ब के विज्ञापन कि तरह सारे घर का बदल डालूँगा कि तर्ज पर पूरी पार्टी का ढांचा बदल दिया जाय और इसमे हर्ज ही क्या है । क्योकि सब कुछ खोने से तो बेहतर है कुछ नया कर कुछ न कुछ जरूर पा लिया जाय ।