सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

ना समझो तो अनाड़ी हो


गुरमेहर कौर कौन है मैं नहीं जानता। उसका खुद का दावा है कि वह कारगिल शहीद की बेटी है। एक ओर खुद को शहीद की बेटी बताती है और दूसरी ओर कहती है मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं युद्ध ने मारा। अब उसकी इस मासूमियत पर राहुल गांधी से लेकर कई लोग रिझने लगे हैं। फिर एक सुर में अभिब्यक्ति की आजादी वाले रेंकने लगे हैं। 
यह लड़की कहती है मैं नहीं डरती। ठीक है डरना भी नहीं चाहिए। गब्बर चाचा ने भी कहा था जो डर गया समझो मर गया । पर जरा अपने गिरेबान में भी झांकिए। आपकों आपके पिता के  शहादत की कीमत नहीं मालूम तो ठीक पर हम जैसे आम भारतीय के लिए वे सदा आदर के पात्र रहेंगे। मेहर तुम उस खालिद के समर्थन में झंडा बुलंद कर रही हो जो सरेआम कहता है भारत तेरे टुकड़े होंगे। उसके कार्यक्रम के लिए पुलिस से भिड़ती हो और जब पुलिस अपना काम करती है तो तुम और तुम्हारे साथी मशाल लेकर पुलिस पर कार्रवाई का नारा बुलंद करते हो। तुम शोसल मीडिया पर किसी को कोसो तो कोई बात नहीं पर जब कोई तुम्हे जवाब दे तो वह सांप्रदायिक हो जाता है। राजनीति का इतना ही शौक है तो छोड़ो पढ़ाई लिखाई और कूद पड़ों राजनीति में । बहुत सारे दल और लोग तुम्हें हाथों हाथ लेने को तैयार हैं। पर ज्यादा नहीं बस एक साल पीछे मुड़कर देख लेना कन्हैया कुमार अब कहां हैं किसी को नही पता। उसका जितना प्रयोग जिसको करना था उसने कर लिया। तुम भी सोच लेना कहीं तुम्हारा भी हश्र वैसा ही न हो । यह एक सुझाव है धमकी नहीं । ऐसा इसलिए लिखना पड़ कि पता नही तुम इस सुझाव को बताने लगो कि देखिए एक और धमकी मिल रही है कारगिल शहीद की बेटी को । 
कारगिल शहीद की शहादत को कितना भुनाओगी तुम देशद्रोहिओं के लिए। वैसे मैं राष्ट्रभक्ति या देशद्रोह का प्रमाणपत्र बांटने नहीं बैठा हूं पर यह जरूर कह सकता हूं कि उमर खालिद कभी देश का सगा नहीं हो सकता । गांव का रहने वाला हूं यह भी जानता हूं कि कई ऐसे पौधे होते हैं जिनको खेत से तो हर चीज चाहिए पर वो नुकसान खेत का ही करते हैं।  इसिलए इन अमरबेलों को बढ़ने से पहले ही कतर देना जरूरी है वरना ये पूरे पेड़ को सुखा देंगे।
अंतत: किसी से डरो मत तो किसी को डराओ भी मत।  अगर तुमको बोलने की आजादी चाहिए तो दूसरे को भी बोलने की उतनी ही आजादी दो। अपनी विचारधारा का प्रयोग दूसरों का दिल जीतने के लिए करों दूसरों का कोसने  के लिए नहीं । सहवाग की ट्विटर पर टिप्पणी तुम्हारे हर सवाल का सटीक जवाब है पर अगर तुम ना समझो तो अनाड़ी हो।

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

डरने की जरूरत नहीं

डरने की जरूरत नहीं
पिछले दो दिनों से शोसल मीडिया पर कुछ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मांगने वाले लोग फिर चिल्लाने लगे हैं। नया नारा है हम एबीवीपी से नहीं डरते। अरे भाई कौन कह रहा है कि आप डरो ।  जब आप को अपने मां-बाप से डर नहीं है तो फर एक संगठन से डरने की क्या जरूरत है। आप स्वतंत्र हैं स्वछंद है फर डर काहे का। हां अगर किसी को बदनाम करने का आपका यह अभियान है तो कोई बात नहीं । आप कहीं कुछ करे तो आजादी और दुसरा कुछ करे तो भय । यह नहीं चलेगा। अलोचना करिए तो आलोचना सहना भी सीखना होगा।  अगर आईसा को बोलने की आजादी है तो यही आजादी एबीवीपी को भी होनी चाहिए। आप कहीं आंदोलन करे पुलिस का कानून ताड़े तो पुलिस को हक है कि वह बल प्रयोग करे। उससे बचना आपका काम है। क्योंकि अगर पुलिस वाले कार्रवाई नहीं करें तो भी गाज उन्हीं पर गिरेगी क्योकि आप तो देश को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
इसलिए हे विश्व में समाप्त हो रहे वामपंथ के पुजारियों इस देश में आपको कतई डरने की जरूरत नहीं है। इस देश की परंपरा बहुत ही सहनशील रही है। यहां देशद्रोही भी अभयदान पा सकता है। इसलिए डर का ढिंढोरा मत पीटिए और एक कारगिल शहीद को बदनाम न कीजिए क्योंकि आपके नारे सुनकर उसका बिलदान व्यर्थ हो जायेगा। उसकी आत्मा आको कोसेगी कि मैने ऐसे पुत्र या पुत्र को जन्म ही क्यो दिया जो अभिव्क्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश को बांटने वालों का समर्थन करे/करेगी।आप सड़को पर हल्ला करे तो यह लोतांत्रिक और एबीवीपी आपका विरोध करे तो यह अलोकतांत्रिक। यह दोरा मापदंड है यह बंद होना चाहिए। दादरी में अखलाख की हत्या हुई जो सर्वथा अनुचित थी । तब बड़े बड़ वामियें ने दनादन अपने पुरस्कार लौटाने की घेषणा कर डाली पर अभी हरल में तारेक फतेह पर हमला हुआ तो किसी ने चूं नहीं बोला, यह दोगलापन इस देश में नही चलेंगा। अगर इस तरह का दोगलापन होगा तो आपको डरना होगा । अगर आपके दूसरे की आलोचना को सहज में लें तब फिर आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है चाहे आपके चिता कारगिल शही हों या फिर  एक मामूली नागरिक।

परचम तो भाजप का ही लहराएगा


कल  यानी 27 फरवरी को यूपी चुनाव का पांचवां चरण समाप्त हो जायेगा। विद्वान लोग शोसल मीडिया पर अपनी- अपनी विद्वता लीक करने में लगे हैं। वैसे परिणाम तो 11 मार्च को आयेंगे और चुनावों के परिणाम की भविष्यवाणी करना अभी लाटरी के खेल की तरह है। स्तरहीन होती राजनीति ने इस कदर भरमा दिया है कि बड़े से बड़ा  विश्लेषक भी परिणाम के बारे में दावा करने की स्थिति में नहीं है।
फिर भी पांचवां चरण आते आते यह तय हो गया है कि प्रदेश में सबकी लड़ाई अब भाजपा से ही है। अखिलेश, माया, राहुल के मोदी पर तीखे शब्दबाण तो इसी ओर ईशारा करते हैँ। वैसे भी 2007 और 2012 के चुनावों में किसी एक दल को बहुमत न मिलने की बात हुई थी पर परिणामों ने सारे पूर्वानुमान उलट दिए थे। वैसे भी यह चुनाव पूरी तरह जातिय और धार्मिक रूप से गोलबंद होकर लड़ा जा रहा है। मुद्दों की बात पीछे चली गई है। विकास चुनावी अखाड़े में बौना हो गया है। लोगों की समस्यायें जातिय गोलंदी में समाप्त हो गईं हैं। हां एक बात जरूर है कि कानून व्यवस्था  और बिजली , पानी तथा सड़क कहीं ना कहीं मुद्दा जरूर है। इस गोलबंदी  और कुछ ज्वलंत मुद्दों का फायदा भाजपा को तेजी से िमल रहा है। यादव मतों को छोड़कर अन्य पिछड़ी जातियों का समर्थन भाजपा के लिए बरदान बनता जा रहा है। बसपा का साथ दे चुके ब्राह्मण् मत भी भाजपा की ओर लौट चुके हैं। यह भी साफ दिखने लगा है कि हर जगह दूसरे दल भाजपा से ही लड़ रहे हैं। टिकट बंटवरे के दौरान जिन्हें कमजोर माना जा रहा था वे भाजपा उम्मीदवार अब जीतने की स्थिति में आ गये हैं। सपा, बसपा और कोंग्रेस की हताशा यह चुगलखेरी करने लगी है कि इन दलों ने हार मान लिया है।
विभिन्न क्षेत्रों से मिले इनपुट के आधार पर मै 11 मार्च से पूर्व यह कहने की स्थिति में हूं कि इन चुनावों में यूपी में भाजपा को 250 से भी अधिक सीटें मिल जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इसके साथ ही भाजपा का परचम उत्तराखंड और गोवा में भी लहराएगा। हां प्रजाब का परिणाम जरूर अलग हो सकता है। यहां कांग्रेस के सत्ता में आने की प्रबल संभावना है। हालांकि आम आदमी पार्टी का यहां बहुत कुछ दांव पर लगा है पर सिद्धू फैक्टर के कारण कांग्रेस उस पर भारी पड़ेगी।