बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

पूरब कि रौशनी

हाल के महीनों की राजनितिक गतिविधियाँ पूर्वांचल को किसी न किसी रूप में विशेष दर्जा देंती प्रतीत होती हैं । क्या उत्तर प्रदेश के मिशन २०१२ के कुरुक्षेत्र क केंद्र पूर्वांचल होगा । राजनितिक हलचल तो कम से कम यही चुगली कर रहें हैं।
कांग्रेश के मिशन २०१२ के सेनापति और पार्टी महासचिव राहुल गाँधी ने बीते साल सर्दियों में एक रात पूर्वांचल क दिल जितने को जब ट्रेन से गुप्त यात्रा की तो इसे राजनितिक विश्लेषकों ने सामान्य रूप में लिया। कुछ ने तो इसे राहुल क शगल भर करार दिया। समय बीतने के साथ ही इस यात्रा के निहितार्थ समझ में आने लगे हैं। लोकमंच के संयोजक अमर सिंह ने पूर्वांचल स्वाभिमान यात्रा निकल कर राजनितिक दलों को पूर्वांचल के महत्व पर सोचने पर मजबूर कर दिया है। हिन्दू युवा वाहिनी के बैनर तले goraksha peeth ke उत्तराधिकारी और भाजपा संसद योगी आदित्य नाथ की हिन्दू चेतना रैली ने पुन्यांचल नाम से ही सही इस महत्व को और मजबूती प्रदान की है। प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अपने विकास कार्य निरिक्षण दौरे की शुरुआत गोरखपुर से ही कर यह जाता दिया की मिशन २०१२ की शुरुआत बसपा भी यहीं से करेगी और कर मायावती ने पूर्वांचल के समर्थन में प्रतीकात्मक संकेत अवश्य दे दिया है। वर्ष २०११ की शुरुआत में राज्य की मुख्या विरिधि दल सपा ने पूर्वांचल की भावी राजधानी गोरखपुर में अपना राज्य सम्मलेन कर कुछ जताने का प्रयास तो किया ही भले ही सार्वजानिक रूप से पार्टी और उसके नेता पूर्वांचल क विरोध कर रहें हैं। उनका यह सम्मलेन यह बताने के लिया काफी है कि pउर्वंचल और मिशन २०१२ के बीच कुछ न कुछ जरूर है।
उत्तर प्रदेश का पंजाब अर्थात गंगा , जमुना, सरयू, राप्ती और गण्डकी , इन पञ्च नदियों से सिंचित लगभग पांच कोटि कि आबादी वाला यह क्षेत्र अब तक केवल गरीबी और पिछड़ेपन के लिए जाना जाता रहा है। वर्षों से दमन के कारन इन नदियों के तट पर रहने वाले लोग अपने चातुर्य , वीरता , वैराग्य और उपकार कि बातें भूल बैठे । लेकिन इन पांच नदियों का पानी आज दिल्ली , मुंबई कि राजनीति में भी उबाल पैदा करने के लिए काफी है। पूर्वांचल कि गरीबी अब इसके लिए वरदान बन गई गई है। यहाँ के जियालों ने अपनी मिटटी छोड़ खुद के श्रम से हर जगह अपनी पहचान बनायीं । पूरब के लाल एक बार फिर अपनी मिहनत के बलबूते सिरमौर बन कर उभर रहें हैं। उत्तर प्रदेश में ११७ विधान सभाओं में अब केवल पूरब कि मर्जी चलेगी तो साथ ही प्रदेश के कुछ बड़े शहरों कि कई विधानसभाओं में कोई भी रजनीतिक दल पुरबिओं को नजरंदाज नहीं कर सकता ।
अब यह कहना कत्तई गलत नहीं होगा कि पूरब कि अवहेलना यहाँ के आवाम को बर्दाश्त नहीं होगा । पिछले दशक से ही विभिन्न दलों कि सरकारों द्वारा पूर्वांचल निधि के नाम से अलग से बजट देना यह दर्शाता है कि दलों को इस क्षेत्र और यहाँ के वोट बैंक कि चिंता जरूर है। कुल मिला कर स्थितियां बता रहीं हैं कि अब माहौल बदल रहा है । कुछ लोगों और दलों का पूर्वांचल के प्रति सौतेला भाव दिखाई दे रहा है लेकिन अंगडाई लेता पूर्वांचल जब जागेगा तो प्रदेश और देश को एक नयी रौशनी अवश्य देगा।