सोमवार, 25 मई 2009

कहाँ के युवा और कैसे युवा

सैकडो साल गुलामी में जीने के बाद भी भारतीय जनमानस अब तक अपनी मानसिकता को बदल नहीं पाया है। १५ वीं लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली अप्रत्याशित सफलता को कांग्रेसी नेता राहुल बाबा की नीतियों की जीत बता रहें हैं और हर मौके पर राहुल का गुणगान कर रहें हैं । मैं राहुल गाँधी का विरोधी नहीं हूँ पर भारतीय राजनीती के कुछ बड़े नाम जब इस जीत का श्रेय जब केवल राहुल बाबा को देते हैं तो इसमे साफ कहा जय तो चमचागिरी की एक झलक दिखाई देती है । भारतीय राजनीती को इस मानसिकता से उबरना होगा । देश के हर दल में कमोबेश यह मानसिकता देखने को मिल रही है। रही बात युवाओं की तो यह सही है की देश की संसद में इस बार अपेक्षाकृत अधिक युवा चुन कर आयें हैं , परन्तु इनमे से अधिकतर वे चेहरे हैं जिन्हें राजनीति vइरासत में मिली है । किसी के पिता सांसद थे तो किसी की मंत्री या पूर्व मुख्यमंत्री। और इस बार संसद में पहुंचे अधिकतर चेहरे अपनी विरासत के बल पर इस मुकाम तक पहुंचे हैं । सम्भव है ये युवा अपनी सोच से अपने माँ-बाप से आगे निकल जायें पर यह कहना ग़लत होगा की ये सभी भारत की दस करोड़ युवा शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं क्योकि इनमें ख़ुद अपनी जमीं तैयार कर इस मुकाम तक शायद कोई नहीं पहुँचा है । भारत की युवा शक्ति तो फिलहाल अपने परिवार की चिंता में नौकरियों के आवेदन लिए इस शहर से उस शहर तक धक्का खा रही है । युवाओं की इस बदहाली के लिए स्पष्ट रूप से देश की पिछली सरकारें और उनकी नीतियाँ जिम्मेवार रहीं हैं। आधुनिकीकरण के इस दौर में कम होती नौकरियां और बढाती आबादी भी उनकी बदहाली की जिम्मेवार है। एक असुरक्षा की भावना जो भारतीय युवाओं में है उसे दूर करने सम्बन्धी नीतियाँ बनानी होगी। भारत के सामान्य युवाओं के सर से असुरक्षा की भावना को दूर कर उनको देश की मुख्य राजनीति में लाना होगा तब हम कह सकते हैं की देशकी युवा शक्ति जग रही है वरना वंशवाद की सीढ़ी चढ़ कर राजनीतिक मुकाम हासिल करने वाले लोगो को ही युवा शक्ति के नाम पर यह मुकाम हासिल होता रहेगा।

सोमवार, 18 मई 2009

अब तो संभालिये अडवानी जी

क्यों गठबंधन धर्म निभाने के चक्कर में अपनी पार्टी का बंटाधार कराने में जुटे हैं । अब तो चेत जाइये । नवीन पटनायक को देख लिया था फ़िर अजित सिंह को देखा थोड़ा और इंतजार कर लीजिये नीतिश और बादलको भी साथ छोड़ते देखना पड़ेगा । जब आपके घटक दलों को आपकी चिंता नहीं है तो फ़िर आप क्यों दूसरो की चिंता में दुबले हो रहें हैं । १७ मई से १८ मई के बस एक दिन में एक बार फ़िर पुरे देश ने मजबूत नेता को कमजोर होते हुए देखा । एक दिन में ही निर्णय बादल गया । इससे एक बार फ़िर ऐसा लगाने लगा की आप अपनी बात पर टिकने वाले नहीं हैं । फ़िर ऐसे में आप में भरोसा न जाता कर देश की जनता ने तो ठीक ही किया । पार्टी और देश दोनों को बख्श दीजिये यह दोनों पर आपका बड़ा उपकार होगा । नौजवानों के सामने बूढों को मत परोसियों आपका कम मार्गदर्शन का है वह करते रहिये । इससे आप भाजपा पर बड़ा उपकार करेंगें । रही बात सहयोगी दलों की तो आप और आपकी पार्टी को कांग्रेस की तरह ही बैशाखी का सहारा लेना चोर देना पड़ेगा अन्यथा न तो घर के रह जायेंगें न ही घाट के। आप सरे जतन कर लें आपके सहयोगी दल समय समय पर ऑंखें दिखातें ही रहेंगें । इसलिए एक बिन मांगी बिनम्र राय mअन लीजिये और एकला चलो का नारा बुलंद कीजिये देखिये सफलता आपकी और आपकी पार्टी के क़दमों में होगी।

कांग्रेस से सबक लें भाजपा और अडवानी

2००४ के चुनाव के बाद पूरी कांग्रेस सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री बनने की जिद पर अडी थी पर सोनिया ने एक बार जो फैसला लिया उस पर अंत तक टिकीं रहीं । बाद में कोंग्रेस ने इसे त्याग के रूप में भुनाया और भारतीय जनता ने इसे त्याग मन भी। इस त्याग का प्रतिफल कांग्रेस को २००९ के चुनाव में मिला । दूसरी ओरभाजपा के लौह पुरूष लाल कृष्ण अडवाणी दो अवसरों पर त्याग तो किया पर उस पर कायम नहीं रह सके । जिन्ना प्रकरण के बाद नेता पद तो छोड़ा पर अपनी बात पर कायम नहीं रह सके । इसे लोगो ने सत्ता लोलुपता माना और जनता के मन में ये बात कहीं न कहीं घर कर गईं किभाजपा और उसके नेता सत्ता के पीछे भागते हैं और इनके अन्दर त्याग कि भावना नहीं है ।

२००९ के चुनाव परिणाम के बाद भाजपा फ़िर वाही गलती दोहराने जा रही है । इस गलती के सूत्रधार भी अडवाणी ही बनते दिख रहें हैं । पहले तो अडवाणी ने राजनीति से संन्यास lएने कि बात कही , कहा नेता प्रतिपक्ष पद पर नहीं रहूँगा पर उनका मन अब बदलता दिख रहा है पार्टी के नुकसान के नाम और दबाव के बाद वह पुनर्विचार पर जाजी होते दिख रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो यह अडवाणी और भाजपा दोनों के लिए आत्मघाती कदम साबित होगा । इसलिए अच्छा यही होता कि पद छोड़ अडवाणी पार्टी में त्याग कि नई परम्परा शुरू करते ताकि पार्टी के अन्य नेता भविष्य में उनके इस कदम का अनुसरण करते ।

इसके साथ ही गठजोड़ के सहयोगी भी भाजपा के लिए भरोसेमंद साबित नहीं हो रहें हैं । गठबंधन धर्म निभाने के चक्कर में पार्टी अपने संगठन का भी नाश कराने पर तुली है । राजग के संयोजक शरद यादव हर का ठीकरा मोदी और वरुण पर फोड़ रहें हैं तो नीतिश कुमार कह रहें हैं कौन राजग और कैसी बैठक , कल तक सहयोगी रहे अजित सिंह भी सत्ता के मोह में राजग को ऑंखें दिखाने लगें हैं । ऐसी स्थिति में भाजपा को अपने सहयोगियों के बारे में एक बार फ़िर से बिचार करना होगा । क्यों न भाजपा भी कांग्रेस कि तरह हर जगह अलग चुनाव मैदान में उतरे और अपनी ताकत देखे । ऐसा कर वह कम से कम सहयोगी दलों के ब्लैकमेलिंग से बच सकेगी और भारत में राष्ट्रीय स्तर पर ख़ुद को स्थापित कर सकेगी। इससे देश में कम से कम छोटे दलों द्वारा कि जा रही ब्लैकमेलिंग से बचा जा सकेगा और देश के विकास को सही गति मिल सकेगी .

रविवार, 17 मई 2009

बदलने का समय

१५ वीं लोकसभा के परिणाम आ चुके हैं । हर दल परिणामो की अपनी अपनी तरह से विश्लेषण करने में जुटे हैं। २००४ की करारी हार के बाद भी भाजपा ने कोई सबक नही लिया और अक बार फ़िर जनता को अपनी बात नहीं समझा पाई । पुरे चुनाव में भाजपा के पास न तो कोई अपना अजेंडा था न ही कोई दृष्टिकोण। बावजूद इसके वह केन्द्र में सरकार बनाने का सपना जरूर पाल बैठी । यही नहीं पार्टी में राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर संगठन में समन्वय और तालमेल का भारी अभाव रहा । टिकट वितरण से लेकर चुनावों तक हार स्तर पर पार्टी में कलह होता रहा । यह कलह छोटे नेताओं में नही बल्कि राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के बीच रही । खैर जो हुआ सो हुआ पर अब भाजपा को संभलना होगा । कुछ नहीं तो भाजपा के दिग्गज नौसिखिया कहे जाने वाले कांग्रेस के खेवनहार राहुल गाँधी से सबक लेकर पहले संगठन को ठीक करे । अनुशाशानाहीन नेताओं को चाहे वह कितना बड़ा क्यों न हो उसे बहार का रास्ता दिखाए और औरों से ख़ुद को अलग दिखने की पुराणी परम्परा पर कायम रहे । इसके साथ ही यदि उसे गठबंधन की राजनीती करनी है तो कुछ ऐसे विवादास्पद मुद्दौं को फिलहाल छोड़ दे जिनसे उनके सहयोगी भड़क सकते हैं और यदि उसे अपने एजेंडे का ही पालन करना है तो फ़िर वह गठजोड़ की राजनीती को अलविदा कह पूर्ण रूप से अपने एजेंडे पर चले। अन्यथा उसे देर सबेर बिहार में भी ओडिसा की तरह की समस्या का सामना करना पड़ेगा और नितिसकुमार भाजपा को बिहार में दूध की माखी की तरह निकल फेकेंगे ।