2००४ के चुनाव के बाद पूरी कांग्रेस सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री बनने की जिद पर अडी थी पर सोनिया ने एक बार जो फैसला लिया उस पर अंत तक टिकीं रहीं । बाद में कोंग्रेस ने इसे त्याग के रूप में भुनाया और भारतीय जनता ने इसे त्याग मन भी। इस त्याग का प्रतिफल कांग्रेस को २००९ के चुनाव में मिला । दूसरी ओरभाजपा के लौह पुरूष लाल कृष्ण अडवाणी दो अवसरों पर त्याग तो किया पर उस पर कायम नहीं रह सके । जिन्ना प्रकरण के बाद नेता पद तो छोड़ा पर अपनी बात पर कायम नहीं रह सके । इसे लोगो ने सत्ता लोलुपता माना और जनता के मन में ये बात कहीं न कहीं घर कर गईं किभाजपा और उसके नेता सत्ता के पीछे भागते हैं और इनके अन्दर त्याग कि भावना नहीं है ।
२००९ के चुनाव परिणाम के बाद भाजपा फ़िर वाही गलती दोहराने जा रही है । इस गलती के सूत्रधार भी अडवाणी ही बनते दिख रहें हैं । पहले तो अडवाणी ने राजनीति से संन्यास lएने कि बात कही , कहा नेता प्रतिपक्ष पद पर नहीं रहूँगा पर उनका मन अब बदलता दिख रहा है पार्टी के नुकसान के नाम और दबाव के बाद वह पुनर्विचार पर जाजी होते दिख रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो यह अडवाणी और भाजपा दोनों के लिए आत्मघाती कदम साबित होगा । इसलिए अच्छा यही होता कि पद छोड़ अडवाणी पार्टी में त्याग कि नई परम्परा शुरू करते ताकि पार्टी के अन्य नेता भविष्य में उनके इस कदम का अनुसरण करते ।
इसके साथ ही गठजोड़ के सहयोगी भी भाजपा के लिए भरोसेमंद साबित नहीं हो रहें हैं । गठबंधन धर्म निभाने के चक्कर में पार्टी अपने संगठन का भी नाश कराने पर तुली है । राजग के संयोजक शरद यादव हर का ठीकरा मोदी और वरुण पर फोड़ रहें हैं तो नीतिश कुमार कह रहें हैं कौन राजग और कैसी बैठक , कल तक सहयोगी रहे अजित सिंह भी सत्ता के मोह में राजग को ऑंखें दिखाने लगें हैं । ऐसी स्थिति में भाजपा को अपने सहयोगियों के बारे में एक बार फ़िर से बिचार करना होगा । क्यों न भाजपा भी कांग्रेस कि तरह हर जगह अलग चुनाव मैदान में उतरे और अपनी ताकत देखे । ऐसा कर वह कम से कम सहयोगी दलों के ब्लैकमेलिंग से बच सकेगी और भारत में राष्ट्रीय स्तर पर ख़ुद को स्थापित कर सकेगी। इससे देश में कम से कम छोटे दलों द्वारा कि जा रही ब्लैकमेलिंग से बचा जा सकेगा और देश के विकास को सही गति मिल सकेगी .


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