छह दिन बीत गये। भाजपा यूपी में सीएम नहीं तय कर पाई। इस बात को लेकर भाजपा जितनी परेशान नहीं है उतनी उसके विरोधी परेशान हैं। उससे भी अधिक वे परेशान हैं जो किसी न किसी कारण से हर बात में मोदी और भाजपा का सदैव विरोध करते रहे हैं। कुछ लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं तो कुछ प्रदेश में सरकार न होने की। इन सबसे ज्यादा चैनल वाले परेशान है और रोज-रोज नया नाम उछाल रहे हैं। फेसबुक से लेकर ह्वाट्सएप पर दौड़ने वाल खबरों को पक्की मान बुलेटिन चलाने लगते हैं। इन सबसे लोग भ्रमित हो रहे हैं।
कल यानि शनिवार को यूपी की कमान कौन संभालेगा यह तय हो जाएगा। अब तक जिन नामो की चर्चा चल रही है संभवत: इनमें से कोई भी प्रदेश की कमान संभालने नहीं जा रहा है। मेरी अब तक की जो भी राजनीतिक समझ है उसके आधार पर मै यह कहने की स्थिति में हूं कि न तो राजनाथ सिंह ना ही मनोज सिन्हा सीएम होने जा रहे हैं। इसके पीछे मेरा अपना तर्क है। यह तक गलत भी हो सकता है और सही भी। यह तो समय बतायेगा कि सही क्या है और गलत क्या।
पहली बात भाजपा को जो प्रचंड बहुमत मिला है क्या वह उसको यें ही जाया कर देगी। कतई नहीं। उत्तराखंड में सीएम की घोषणा कर पार्टी ने कुछ संकेत तो दे ही दिया है। अब कोई इसे ना समझ पाये तो उसे क्या कहा जा सकता है। मेरा मानना है कि पार्टी ओबीसी को ही राज्य की कमान देगी। ऐसा कर वह उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के साथ न्याय ही करेगी। अगर किसी कारण से ओबीसी की बात नही बनती तो जिम्मेदारी किसी ऐसे नेता को दी जायेगी जिसका कोई बहुत बड़ा जातिगम आधार नहीं हो । ऐसा कर भाजपा जाति आधारित राजनीति न अपनाने का दावा कर सकती है और एक टिकट में दो खेल कर सकती है।
अब केशव या मनोज सिंहा। ये दोनों फिलहाल मुझे तो मुख्यमंत्री बनते नहीं दिख रहे। यह सही है कि केशव ने चुनावों में जीतोड़ मेहनत की पर प्रशासनिक अनुभवहीनता उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। उत्तर प्रदेश जेसे बड़े राज्य की कमान िकसी नौसीखिए को सौंप कर भाजपा अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहेगी। यही हाल मनोज सिंहा की भी है। केवल शाह या मोदी से निकटता उनकी सबसे बड़ी पूंजी जरूर हरे सकती है पर यह सूबे की कमान संभलने की बड़ी योग्यता नहीं हो सकती। श्री सिंहा जातिगत समीकरणों में भी फिट नहीं बैठते हैं। कुल मिलाकर अब शेष बचता है ब्राह्मण, ओबीसी और दलित चेहरा । मुझे लगता है कि इसी बर्ग के किसी ब्यक्ति को कमान सौंपी जायेगी ताकि 2019 के आम चुनाव में पार्टी को सामाजिक समीकरण साधने के लिए बहुत मेहनत न करनी पड़े। 'योगी जी को कमान सौंप कर भाजपा हिदुत्ववादी चेहरे को भी आगे कर सकती है। इससे वह एक तीर से कई निशाने साध लेगी। एक संभावना यहभी लग रही है कि िकसी ओबीसी को कमान सौंपकर एक ब्राह़मण और क्षत्रिय को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी जाए। 18 मार्च का इंतजार कीजिए और संभवत: एक चौकाने वाला नाम आपके सातने होगा।
कल यानि शनिवार को यूपी की कमान कौन संभालेगा यह तय हो जाएगा। अब तक जिन नामो की चर्चा चल रही है संभवत: इनमें से कोई भी प्रदेश की कमान संभालने नहीं जा रहा है। मेरी अब तक की जो भी राजनीतिक समझ है उसके आधार पर मै यह कहने की स्थिति में हूं कि न तो राजनाथ सिंह ना ही मनोज सिन्हा सीएम होने जा रहे हैं। इसके पीछे मेरा अपना तर्क है। यह तक गलत भी हो सकता है और सही भी। यह तो समय बतायेगा कि सही क्या है और गलत क्या।
पहली बात भाजपा को जो प्रचंड बहुमत मिला है क्या वह उसको यें ही जाया कर देगी। कतई नहीं। उत्तराखंड में सीएम की घोषणा कर पार्टी ने कुछ संकेत तो दे ही दिया है। अब कोई इसे ना समझ पाये तो उसे क्या कहा जा सकता है। मेरा मानना है कि पार्टी ओबीसी को ही राज्य की कमान देगी। ऐसा कर वह उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के साथ न्याय ही करेगी। अगर किसी कारण से ओबीसी की बात नही बनती तो जिम्मेदारी किसी ऐसे नेता को दी जायेगी जिसका कोई बहुत बड़ा जातिगम आधार नहीं हो । ऐसा कर भाजपा जाति आधारित राजनीति न अपनाने का दावा कर सकती है और एक टिकट में दो खेल कर सकती है।
अब केशव या मनोज सिंहा। ये दोनों फिलहाल मुझे तो मुख्यमंत्री बनते नहीं दिख रहे। यह सही है कि केशव ने चुनावों में जीतोड़ मेहनत की पर प्रशासनिक अनुभवहीनता उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। उत्तर प्रदेश जेसे बड़े राज्य की कमान िकसी नौसीखिए को सौंप कर भाजपा अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहेगी। यही हाल मनोज सिंहा की भी है। केवल शाह या मोदी से निकटता उनकी सबसे बड़ी पूंजी जरूर हरे सकती है पर यह सूबे की कमान संभलने की बड़ी योग्यता नहीं हो सकती। श्री सिंहा जातिगत समीकरणों में भी फिट नहीं बैठते हैं। कुल मिलाकर अब शेष बचता है ब्राह्मण, ओबीसी और दलित चेहरा । मुझे लगता है कि इसी बर्ग के किसी ब्यक्ति को कमान सौंपी जायेगी ताकि 2019 के आम चुनाव में पार्टी को सामाजिक समीकरण साधने के लिए बहुत मेहनत न करनी पड़े। 'योगी जी को कमान सौंप कर भाजपा हिदुत्ववादी चेहरे को भी आगे कर सकती है। इससे वह एक तीर से कई निशाने साध लेगी। एक संभावना यहभी लग रही है कि िकसी ओबीसी को कमान सौंपकर एक ब्राह़मण और क्षत्रिय को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी जाए। 18 मार्च का इंतजार कीजिए और संभवत: एक चौकाने वाला नाम आपके सातने होगा।

