गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

दाग अच्छे हैं


2जी घोटाला मामले में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने सभी 25 आरोपियों को बरी कर दिया है। इस पैसले से कांग्रेस का खुश होना लाजिमी है। उसका मानना है कि इस फैसले ने उसपर लगा एक बड़ा दाग धो दिया । पर अभी उसकी खुशी वैसी ही है जैसे चलो भाई ये दाग है तो दाग ही अच्छे है। फसले के खिलाफ उपरी अदालते क्या निर्णय देंगी यह तो भविष्य के गर्भ में है। पर यह खुशी कुछ दिन की खुशी होगी या फिर स्थाई यह कहना अभी मुश्किल है।
कल तक इस मुछ्दे पर रक्षात्मक रुख रखने वाली कांग्रेस के नेता एकाएक हमलावर होने लगे हैँ।  गुलाम नबी आजाद कहते है कि जिस घोटाले की वजह से यूपीए 2 की सरकार चली गई वह घोटाला हुआ ही नहीं। पूर्व पीएम मनमोहन सिंह  जो हमेशा चुप रहने के लिए जाने जाते है वह भी इस फैसले पर चहक उठे और कहा 'मेरे खिलाफ किया गया दुष्प्रचार निराधार साबित हुआ।
 जीरो लॉस का सिद्धांत देने वाले पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्‍बल तो  बल्लियों उछलने लगे  । उन्होंने सरकार को ललकारते हुए कहा कि हमारा 'जीरो लॉस' का दावा सिद्ध हो गया है, जिन लोगों ने उन पर आरोप लगाए उन्हें माफी मांगनी चाहिए। 'आज मेरी बात सिद्ध हो गई, कोई घोटाला नहीं, कोई घाटा नहीं। अगर घोटाला है तो, झूठ का घोटाला है, विपक्ष और विनोद राय के झूठ का।  और तो और सिब्बल ने विनोद राय से पूरे  देश के सामने माफी मांगने की मांग भी कर डाली।
जािहर है सरकार की ओर से इसका जवाब उाना था और आया भी। कांग्रेस की बौछारों का सामना करने आये वित्त मंत्री अरुण जेटली।
अपने आरोपों पर पूरी तरह कायम रहते हुए  उन्होंने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा इस फैसले को कांग्रेस सममान पत्र की तरह लहरा रही है।  उन्होंने यूपीए की स्पेक्ट्रम आवंटन नीति को पूरी तरह भ्रष्ट करार देते हुए  2012 में सुप्रीम कोर्ट के पैसले का हवाला भी दिया।  यही नहीं लगे हाथ आंकड़ो से उन्होने कांग्रेस को घेरा और कह कि जिस स्पेक्ट्रम पर पहले 1734 करोड़ मिल रहे थे 2015 में 1.10 लाख करोड़ रुपए मिले।
यह तो रही फैसले पर राजनीति की बात। अब इसके दूसरे पहलू पर गौर करते हैं। विशेष जज का दर्द यह है कि वह सात साल तक सबूतों का इंतजार करते रहे । कोई सबूत ले कर नहीं आया। मंशा जज साहब पर शक करने या फैसले पर उंगली उठाने की नहीं है। लेकिन मन में एक सवाल तो उठता ही है कि फिर सुप्रीम कोर्ट ने किस सबूत के आधार पर लाइसेंस रद्द किए थे। क्या विशेष जज महोदय ने इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। मैं न कानून का जानकार हु नही उसका विश्लेषक पर एक सवाल तो मन में उठता ही है कि जिस सबूत पर सुप्रीम कोर्ट ने लाइसेंस रद्द किए क्या वे नाकाफी थे। यदि हां  तो फिर तो यह गंभीर मामला है और नहीं तो फिर आज का पैसला।
यूपीए 2 की सरकार पर लगा यह एक बड़ा दाग तो है ही । जब कैग ने उंगली उठाई थी इस सरकार के मुखिया चुप थे। अगर आवंटन गलत था तो ए राजा को मंत्रिमंडल से बाहर क्यों किया गया। सरकार के कई कृत्यों खुद ही घोटाले का संदेह पैदा किया। रही सही कसर सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान दिए गये लाइसेंसों को रद्द कर पूरी कर दी। कोर्ट के आदेश पर ही मामले की सुनवाई विशेष अदालत में की गई। इस मामले में पराजित पक्ष सीबीआई का कहना है कि कोर्ट ने लिखित सबूतों पर मौखिक सबूतों को बरीयता दी। उसका कहना है कि वह इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देगी। अगर उस समय यह फैसला उलट गया तो  जो आज दाग मिटने की बात कर रहें हैं तब क्या कहेंगे।
बाकी तो दाग अच्छे हैं और अच्छे रहेंगे।





बुधवार, 20 दिसंबर 2017

ये नैतिक जीत क्या है भाई

राजनीति भी अजीब चीज है। एक ही बात पर हर पक्ष के अलग-अलग तर्क हैं। गुजरात और हिमाचल में चुनाव संपन्न हुए , परिणाम भी आ गये। दोनों जगह चिर प्रतिद्वदी पार्टियां आमने सामने थीं। चुनाव के दौरान दोनों ने बढ़चढ़ कर दावे किए। अंतिम परिणामों ने दोनों के दावों की पोल खल दी। भाजपा प्रधानमंत्री की साख के बल पर गुजरात में सरकार बचा ले गई। यहां भाजपा को जीत का तोहफा देकर भी गुजरात की जनता ने सबक दे दिया कि सत्ता पाकर अहंकार में न आओ। जनता आपकी समर्थक हो या न हो उसकी बात आपको सुननी होगी। आप शाशक हैं तो उनके दुख दर्द में आपको भागी बनना ही होगा। हां एक बात जरूर यदि भाजपा इसे चेतावनी के रूप में नहीं लेती है तो आगे उसके लिए मुश्किलें बढ़ सकतीं हैं।
वैसे एक बात जरूर है कि कई तरह की अड़चनों , विरोध और प्रचार दुश्प्रचार के बावजूद भाजपा गुजरात में छठी बार सरकार बनाने में सफल रही। पिछले कार्यकाल के मुकाबले उसके सदस्यों की संख्या कम जरूर हुई पर चुनावी जंग में बाजी वही जितता है जो अधिक मेहनत करता है। तय है कि भाजपा ने अधिक मेहनत की और बाजी उसके हाथ लगी।
अब कांग्रेस यहां अपनी हार को नैतिक जीत बता रही है।  उसका दावा है कि गुजरात के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए बड़ा झटका है। पहली बात तो यह कि हार हार होती है। राजनीति खुद नीति है इसलिए नैतिक का मतलब क्या। कांग्रेस को माना पड़ेगा कि उसकी हार हुई है । उसने वह प्रयास नहीं किया जो कहीं जीत के लिए किया जाना चाहिए था। कांगेस अध्यक्ष का नैतिक जीत वाला बयान तो वैसा ही है जेसा कोई बच्चा  फेल होने के बाद यह गिनाना शुरू कर देता है कि उसके साथ पढ़ने वाले फलां फलां भी फेल हो गये है। 22 साल के सत्ता विरोधी लहर को ठीक से न भुना पाना कोंग्रेस की सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी रही। भाजपा की रणनीति के आगे उसके प्रयास छोटे हो गये और परिणाम कांग्रेस लोगों केगुस्से को अपनी जीत में न बदल सकी। यही नहीं गुजरात की बात और वहां नैतिक जीत की बात करने वाली कांग्रेस हिमाचल को भूल जाती है। चुनाव से पहले यहां कांग्रेस की सरकार थी। भाजपा तो गुजरात में अपनी 22 साल पुरानी सरकार बचाले गई पर कांग्रेस अपनी पांच साल पुरानी सरकार भी न बचा सकी। यही नहीं वहां तो उसके खेवनहार बीरभद्र सिंह ने पाटीं की हार के लए अपरोक्ष रूप से आलाकमान को जिम्मेदार ठहरा दिया। यहां कांग्रेस की नैतिकता कहां चली गई पता नहीं।
गुजतात और हिमाचल के परिणाम कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए सबक है। अब कौन इससे कितना सीखता है यह तो भविष्य के गर्भ में है।  हार को हार की तरह लेना बीरता होती है पर उसमें दूसरे की भी हार ढूंढना कायरता।

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

गुजरात 18 को कई अनुमान ध्वस्त होगे



आज यानि 12 दिसंबर को गुजरात में दूसरे और अंतिम चरण का प्रचार समाप्त हो गया। हर कोई अपनी-अपनी जीत का दावा करने में जुट गया है। पहले चरएा में 9 दिसंबर को मतदान हुआ था । कुल 65 से 67 प्रतिशत मतदान की बात हुई। अगला चरण 14 को होगा कितना मत पड़ेगा यह भविष्य के गर्भ में है। 18 को दोपहर तक परिणाम भी आ जाएगा।
पार्टियां जीत के दावे कर रहीं हैं वह तो ठीक है पर भाजपा और कांग्रेस के खेमें में बँटे पत्रकार जो गुजरात की जमीनी हकीकत का क ख ग घ भी नहीं जानते हैं अपनी अपनी भविष्यवाणी करने में जुट गये हैँ। यह सच है कि नरेद्र मोदी के लिए यह चुनाव सबसे कठिन है पर कांग्रेस नेतृत्व की अपरिपक्वता ने उन्हें फिर मौका दे दिया है। मैं भविष्यवक्ता नहीं हूं पर जो थोड़ी बहुत राजनीतिक समझ रखता हूं उसके अनुसार हिमाचल और गुजरात में  भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ सकती है। गुजरात में हार्दिक, मेवानी और जिग्नेश की त्रयी राहुल गांधी के साथ मिलकर जो चतुष्टाकक बनाया है उसका कमाल मोदी मैजिक को कितना कम कर सकता है आंकड़े इस पर निर्भर करेंगे।  मोदी ने अपने गृह राज्य में गुजरात अस्मिता की बात कर 10 से 15 प्रतिशत भाजपा के मतो का मार्जिन वैसे ही बढ़ा लिया है। रही सही कसर राहुल के मंदिर पिरक्रमा ने पूरी कर दी है। वास्तव में कांग्रेस ने गुजरात चुनावों में मोदी को मात देने की सटीक योजना बनाई थी। इसके तहत अपने को मुस्लिम मतो की ओर से तटस्थ रखकर हिन्दुओं को लुभाने की योजना बनाई थी। उनका मानना था कि मुस्लिम मत तो अपने हैं ही अब मंदिरों का रूख कर हिंदू मतो में सेंध लगाई जाय। पर उनकी इस योजना को खुद उन्हीं के लोगों ने सोमनाथ तक जाते जाते पलिता लगा दिया। विकास के नाम पर भाजपा को चुनौती देने निकले राहुल गांधी भाजपा की चाल में फंस गये और मंदिरों के चक्कर लगाने लगे। मैं यह नहीं कहता कि इससे  कांग्रेस का अल्पसंख्क आधार खत्म हो जाएगा पर इसका प्रतिकूल असर  उस वोट बैंक पर जरूर पड़ेगा जिसे कांग्रेस दशकों से अपना मानते आई है। हां एक बात और वाकई अगर गुजरात की जनता 22 साल के भाजपा शासन से उब गई है तब तो परिणाम  क्या होगा मैं इसका आंकलन करने में सक्षम नहीं हूं । परिणाम जो भी हो यह तय है कि कड़े मुकाबले वाली बात नहीं होगी परिणाम एकतरफा होगा। और इसमें फिलहाल भाजपा बढ़त लेते हुए दिख रही है।
यह सही है कि भाजपा के पास गुजरात में स्थानीय स्तर पर कोई चेहरा नहीं है पर कांग्रेस भी तो राज्य स्तर पर कोठ्र विकल्प नहीं दे पाई । अलबत्ता हार्दिक, अल्पेश और मेवानी को तरजीह देकर उसने अपने स्थापित क्षत्रपों को नाराज जरूर किया है। यह नाराजगी भले ही सामने न आई हो पर इसका असर चुनाव परिणामों पर जरूर पड़ेगा।
इंतजार कीजिए 18 दिसंबर का जब परिणाम आएंगे।  कई अनुमान ध्वस्त होंगे । कई व्याख्याएं धराशाई होगी। विद्वानों की बोलती बंद होगी तो कई अपनी बात से पलटते नजर आएंगे और दावा करेंगे कि मैने तो यह कहा था मैने तो वह कहा था। रही बात कांग्रेस की तो उसके पास तो पहले से जवाब तैयार है। उसके तमाम नेता एक स्वर से कहेंगे राहुल जी को इसका दोष कैसे दे सकते है। डनहोंने तो कमान हार्दिक और टीम को सौंप दी थी। हमने आंकलन में गलती की। हो यह जरूर होगा कि अगर कांग्रेस की सीटें बढ़ी, जिसकी संभावना है तो सब चिल्लाएंगे देखा राहुल जी की मेहनत का कमाल । हम भले ही जीत ना पाए पर मोदी को उनके गढ़ में घेर जरूर लिया। सीटों की बढ़त 5 से 7 सीटों तक सँभव है।हां यदि गुजरात का परिणाम कंग्रेस के पक्ष में गया तो यह मान लीजिए कि यह मोदी राज के अवसान की शुरूआत होगी और देश के राजनीतिक क्षितिज पर राहुल नाम के खानदानी तारे के उदय का प्रबल संकेत। वैसे इसकी संभावना कम है फिर भी राजनीति में कब क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता ।
वाकी 18 को...

खबरिया चैनल क्यों देखें?



सुबह हो या शाम। जब भी टीवी खोलो कुछ स्वनामधन्य विद्वान चैनलों पर  एक दूसरे के ऊपर खखुआते नजर आ जाते हैं। इसे देखकर लगता है कि खबरिया चैनलों से तो अच्छा है  तारक मेहता का उल्टा चश्मा या कोई और सीरियल वाला चैनल देख लो । इसमें कमसे कम यह तो पता ही रहता है कि यह नौटंकी है। पर खबर वाले तो खबर के नाम पर नौटंकी फलाते हैं।
वैसे भी इन खबरिया चैनलों के कर्ताधर्ता क्या करें ।  मालिक तो टीआरपी देखता है। टीआरपी विना नौटंकी के बढ़ नहीं सकती । एक और बात सबसे अलग दिखने की चाहत भी इन चैनलों को ऊलूल-जुलूल करने पर मजबूर कर देती है। अब देखिए खबरिया चैनल एक एैसे कथित नेता केबयान को ब्रेकिंग कह कर चलाने लगते हैं कि मशरूम खने से आदमी गोरा हो जाता है। और तो और यह मशरूम अस्सी हजार रुपये किलो बिकती है और ताइवान से आती है। दर्शक मूर्ख बनते रह और चैनल ब्रेकिंग चलाते रहे।  अरे भाई ब्रेकिंग के चक्कर में दूसरों का विश्वास न तोड़ो कम से कम कोई क्या बोल रहा है वह सत्य है कि नहीं इसकी तो छानबीन कर लो।
इसी तरह का दूसरा उदाहरण। जो आदमी नाबालिग होने के कारण चुनाव नहीं लड़ पा रहा है वह गुजरात चुनावों में मोदी और राहुल गांधी से इन चैनलो पर अधिक समय और जगह पा रहा है। गुजरात के  विकास के रोडमैप पर बात करने के लिए  सबसे पहले समय मिल जाए इसकी होड़ चैनलों में लगी रहती है।  अगर विकास के रोड मैप की बात ही करनी थी तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से बात करते, सैम पित्रोदा को बुलाते । लेकिन क्या करे मनमोहन सिंह और पित्रोदा टीआरपी नहीं दे सकते वह तो हार्दिक से ही मिलेगी। और दर्शक बेचारा क्या करे कहीं कोई काम की खबर मिल जाए इसके चक्कर में  इन ..आपों को झेलता रहता है।
कल गुजरात चुनाव खत्म हो जाएगा और शाम 6 बजे के बाद ये चैनल भारी भरकम लेकिन टुटपूंजिए राजनीतिक विश्लेष्क परिणम से पहले ही मंत्रिमँडल गठन करते नजर आएंगे। मोदी समर्थक विद्वान इसे मोदी का करिश्मा बताएंगे तो राहुल के समर्थक इसे राहुल का चमत्कार । कुछ इसे हार्दिक ,जिगनेश और अल्पेश की लड़ाई की जीत या फिर उनकी कमजोरी कहां रह गई इसका बखान करेंगें। जबकि आम दर्शक को इससे कोई मतलब नहीं रहता है।
यह तो रही गुजरात चुनाव की बात । ले दे के 18 को इसका शेर थम जाएगा । पर खबरिया चैनल चुनावी मोड से बाहर नहीं आ पाएंगे। भाजपा की तीत पर सब चैनल शुरू हो जाएंगे  2019 में कोई नहीं है टक्कर में । परिणाम भाजपा के पक्ष् में नहीं रहा तो सब चिललाना शुरु कर देंगे यह राहुल के अभ्युदय का समय है। पैनल में बैठे लोग अपने-अपने हिसाब से तर्क गढ़ कर अगले आम चुनावों में जीत हार की भविष्यवाणी करने में जुट जाएंगे। अरे भाई अगर यही देखना और सुनना है तो फिर क्यों न शुद्ध नौटंकी देखी जाए ।  विद्वानों की नौटकीं देखने से तो अच्छा है जो नौटंकी करने हैं उनको देख जाए कम से कम उनका हौसला तो बढ़ेगा।

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

नाम तो चौंकाने वाला होगा

छह दिन बीत गये। भाजपा यूपी में सीएम नहीं तय कर पाई। इस बात को लेकर भाजपा जितनी परेशान नहीं है उतनी उसके विरोधी परेशान हैं। उससे भी अधिक वे परेशान हैं जो किसी न किसी कारण से हर बात में मोदी और भाजपा का सदैव विरोध करते रहे हैं। कुछ लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं तो कुछ प्रदेश में सरकार न होने की। इन सबसे ज्यादा चैनल वाले परेशान है और रोज-रोज नया नाम उछाल रहे हैं। फेसबुक से लेकर ह्वाट्सएप पर दौड़ने वाल खबरों को पक्की मान बुलेटिन चलाने लगते हैं। इन सबसे लोग भ्रमित हो रहे हैं।
कल यानि शनिवार को यूपी की कमान कौन संभालेगा यह तय हो जाएगा। अब तक जिन नामो की चर्चा चल रही है संभवत: इनमें से कोई भी प्रदेश की कमान संभालने नहीं जा रहा है। मेरी अब तक की जो भी राजनीतिक समझ है उसके आधार पर मै यह कहने की स्थिति में हूं  कि न तो राजनाथ सिंह  ना ही मनोज सिन्हा सीएम होने जा रहे हैं। इसके पीछे मेरा अपना तर्क है। यह तक गलत भी हो सकता है और सही भी। यह तो समय बतायेगा कि सही क्या है और गलत क्या।
पहली बात भाजपा को जो प्रचंड बहुमत मिला है क्या वह उसको यें ही जाया कर देगी। कतई नहीं। उत्तराखंड में सीएम की घोषणा कर पार्टी ने कुछ संकेत तो दे ही दिया है। अब कोई इसे ना समझ पाये तो उसे क्या कहा जा सकता है। मेरा मानना है कि पार्टी ओबीसी को ही राज्य की कमान देगी। ऐसा कर वह उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के साथ न्याय ही करेगी। अगर किसी कारण से ओबीसी की बात नही बनती तो जिम्मेदारी किसी ऐसे नेता को दी जायेगी  जिसका कोई बहुत बड़ा जातिगम आधार नहीं हो । ऐसा कर भाजपा जाति आधारित राजनीति न अपनाने का दावा कर सकती है और एक टिकट में दो खेल कर सकती है।
अब केशव या मनोज सिंहा। ये दोनों फिलहाल मुझे तो मुख्यमंत्री बनते नहीं दिख रहे।  यह सही है कि केशव ने चुनावों में जीतोड़ मेहनत की पर प्रशासनिक अनुभवहीनता उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। उत्तर प्रदेश जेसे बड़े राज्य की कमान िकसी नौसीखिए को सौंप कर भाजपा अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहेगी। यही हाल मनोज सिंहा की भी है। केवल शाह या मोदी से निकटता उनकी सबसे बड़ी पूंजी जरूर हरे सकती है पर यह सूबे की कमान संभलने की बड़ी योग्यता नहीं हो सकती। श्री सिंहा जातिगत समीकरणों में भी फिट नहीं बैठते हैं। कुल मिलाकर अब शेष बचता है ब्राह्मण, ओबीसी और दलित चेहरा । मुझे लगता है कि इसी बर्ग के किसी ब्यक्ति को कमान सौंपी जायेगी ताकि 2019 के आम चुनाव में पार्टी को सामाजिक समीकरण साधने के लिए बहुत मेहनत न करनी पड़े। 'योगी जी को कमान सौंप कर भाजपा हिदुत्ववादी चेहरे को भी आगे कर सकती है। इससे वह एक तीर से कई निशाने साध लेगी। एक संभावना यहभी लग रही है कि िकसी ओबीसी को कमान सौंपकर एक ब्राह़मण और क्षत्रिय को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी जाए। 18 मार्च का इंतजार कीजिए और संभवत: एक चौकाने वाला नाम आपके सातने होगा। 

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

ना समझो तो अनाड़ी हो


गुरमेहर कौर कौन है मैं नहीं जानता। उसका खुद का दावा है कि वह कारगिल शहीद की बेटी है। एक ओर खुद को शहीद की बेटी बताती है और दूसरी ओर कहती है मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं युद्ध ने मारा। अब उसकी इस मासूमियत पर राहुल गांधी से लेकर कई लोग रिझने लगे हैं। फिर एक सुर में अभिब्यक्ति की आजादी वाले रेंकने लगे हैं। 
यह लड़की कहती है मैं नहीं डरती। ठीक है डरना भी नहीं चाहिए। गब्बर चाचा ने भी कहा था जो डर गया समझो मर गया । पर जरा अपने गिरेबान में भी झांकिए। आपकों आपके पिता के  शहादत की कीमत नहीं मालूम तो ठीक पर हम जैसे आम भारतीय के लिए वे सदा आदर के पात्र रहेंगे। मेहर तुम उस खालिद के समर्थन में झंडा बुलंद कर रही हो जो सरेआम कहता है भारत तेरे टुकड़े होंगे। उसके कार्यक्रम के लिए पुलिस से भिड़ती हो और जब पुलिस अपना काम करती है तो तुम और तुम्हारे साथी मशाल लेकर पुलिस पर कार्रवाई का नारा बुलंद करते हो। तुम शोसल मीडिया पर किसी को कोसो तो कोई बात नहीं पर जब कोई तुम्हे जवाब दे तो वह सांप्रदायिक हो जाता है। राजनीति का इतना ही शौक है तो छोड़ो पढ़ाई लिखाई और कूद पड़ों राजनीति में । बहुत सारे दल और लोग तुम्हें हाथों हाथ लेने को तैयार हैं। पर ज्यादा नहीं बस एक साल पीछे मुड़कर देख लेना कन्हैया कुमार अब कहां हैं किसी को नही पता। उसका जितना प्रयोग जिसको करना था उसने कर लिया। तुम भी सोच लेना कहीं तुम्हारा भी हश्र वैसा ही न हो । यह एक सुझाव है धमकी नहीं । ऐसा इसलिए लिखना पड़ कि पता नही तुम इस सुझाव को बताने लगो कि देखिए एक और धमकी मिल रही है कारगिल शहीद की बेटी को । 
कारगिल शहीद की शहादत को कितना भुनाओगी तुम देशद्रोहिओं के लिए। वैसे मैं राष्ट्रभक्ति या देशद्रोह का प्रमाणपत्र बांटने नहीं बैठा हूं पर यह जरूर कह सकता हूं कि उमर खालिद कभी देश का सगा नहीं हो सकता । गांव का रहने वाला हूं यह भी जानता हूं कि कई ऐसे पौधे होते हैं जिनको खेत से तो हर चीज चाहिए पर वो नुकसान खेत का ही करते हैं।  इसिलए इन अमरबेलों को बढ़ने से पहले ही कतर देना जरूरी है वरना ये पूरे पेड़ को सुखा देंगे।
अंतत: किसी से डरो मत तो किसी को डराओ भी मत।  अगर तुमको बोलने की आजादी चाहिए तो दूसरे को भी बोलने की उतनी ही आजादी दो। अपनी विचारधारा का प्रयोग दूसरों का दिल जीतने के लिए करों दूसरों का कोसने  के लिए नहीं । सहवाग की ट्विटर पर टिप्पणी तुम्हारे हर सवाल का सटीक जवाब है पर अगर तुम ना समझो तो अनाड़ी हो।

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

डरने की जरूरत नहीं

डरने की जरूरत नहीं
पिछले दो दिनों से शोसल मीडिया पर कुछ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मांगने वाले लोग फिर चिल्लाने लगे हैं। नया नारा है हम एबीवीपी से नहीं डरते। अरे भाई कौन कह रहा है कि आप डरो ।  जब आप को अपने मां-बाप से डर नहीं है तो फर एक संगठन से डरने की क्या जरूरत है। आप स्वतंत्र हैं स्वछंद है फर डर काहे का। हां अगर किसी को बदनाम करने का आपका यह अभियान है तो कोई बात नहीं । आप कहीं कुछ करे तो आजादी और दुसरा कुछ करे तो भय । यह नहीं चलेगा। अलोचना करिए तो आलोचना सहना भी सीखना होगा।  अगर आईसा को बोलने की आजादी है तो यही आजादी एबीवीपी को भी होनी चाहिए। आप कहीं आंदोलन करे पुलिस का कानून ताड़े तो पुलिस को हक है कि वह बल प्रयोग करे। उससे बचना आपका काम है। क्योंकि अगर पुलिस वाले कार्रवाई नहीं करें तो भी गाज उन्हीं पर गिरेगी क्योकि आप तो देश को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
इसलिए हे विश्व में समाप्त हो रहे वामपंथ के पुजारियों इस देश में आपको कतई डरने की जरूरत नहीं है। इस देश की परंपरा बहुत ही सहनशील रही है। यहां देशद्रोही भी अभयदान पा सकता है। इसलिए डर का ढिंढोरा मत पीटिए और एक कारगिल शहीद को बदनाम न कीजिए क्योंकि आपके नारे सुनकर उसका बिलदान व्यर्थ हो जायेगा। उसकी आत्मा आको कोसेगी कि मैने ऐसे पुत्र या पुत्र को जन्म ही क्यो दिया जो अभिव्क्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश को बांटने वालों का समर्थन करे/करेगी।आप सड़को पर हल्ला करे तो यह लोतांत्रिक और एबीवीपी आपका विरोध करे तो यह अलोकतांत्रिक। यह दोरा मापदंड है यह बंद होना चाहिए। दादरी में अखलाख की हत्या हुई जो सर्वथा अनुचित थी । तब बड़े बड़ वामियें ने दनादन अपने पुरस्कार लौटाने की घेषणा कर डाली पर अभी हरल में तारेक फतेह पर हमला हुआ तो किसी ने चूं नहीं बोला, यह दोगलापन इस देश में नही चलेंगा। अगर इस तरह का दोगलापन होगा तो आपको डरना होगा । अगर आपके दूसरे की आलोचना को सहज में लें तब फिर आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है चाहे आपके चिता कारगिल शही हों या फिर  एक मामूली नागरिक।

परचम तो भाजप का ही लहराएगा


कल  यानी 27 फरवरी को यूपी चुनाव का पांचवां चरण समाप्त हो जायेगा। विद्वान लोग शोसल मीडिया पर अपनी- अपनी विद्वता लीक करने में लगे हैं। वैसे परिणाम तो 11 मार्च को आयेंगे और चुनावों के परिणाम की भविष्यवाणी करना अभी लाटरी के खेल की तरह है। स्तरहीन होती राजनीति ने इस कदर भरमा दिया है कि बड़े से बड़ा  विश्लेषक भी परिणाम के बारे में दावा करने की स्थिति में नहीं है।
फिर भी पांचवां चरण आते आते यह तय हो गया है कि प्रदेश में सबकी लड़ाई अब भाजपा से ही है। अखिलेश, माया, राहुल के मोदी पर तीखे शब्दबाण तो इसी ओर ईशारा करते हैँ। वैसे भी 2007 और 2012 के चुनावों में किसी एक दल को बहुमत न मिलने की बात हुई थी पर परिणामों ने सारे पूर्वानुमान उलट दिए थे। वैसे भी यह चुनाव पूरी तरह जातिय और धार्मिक रूप से गोलबंद होकर लड़ा जा रहा है। मुद्दों की बात पीछे चली गई है। विकास चुनावी अखाड़े में बौना हो गया है। लोगों की समस्यायें जातिय गोलंदी में समाप्त हो गईं हैं। हां एक बात जरूर है कि कानून व्यवस्था  और बिजली , पानी तथा सड़क कहीं ना कहीं मुद्दा जरूर है। इस गोलबंदी  और कुछ ज्वलंत मुद्दों का फायदा भाजपा को तेजी से िमल रहा है। यादव मतों को छोड़कर अन्य पिछड़ी जातियों का समर्थन भाजपा के लिए बरदान बनता जा रहा है। बसपा का साथ दे चुके ब्राह्मण् मत भी भाजपा की ओर लौट चुके हैं। यह भी साफ दिखने लगा है कि हर जगह दूसरे दल भाजपा से ही लड़ रहे हैं। टिकट बंटवरे के दौरान जिन्हें कमजोर माना जा रहा था वे भाजपा उम्मीदवार अब जीतने की स्थिति में आ गये हैं। सपा, बसपा और कोंग्रेस की हताशा यह चुगलखेरी करने लगी है कि इन दलों ने हार मान लिया है।
विभिन्न क्षेत्रों से मिले इनपुट के आधार पर मै 11 मार्च से पूर्व यह कहने की स्थिति में हूं कि इन चुनावों में यूपी में भाजपा को 250 से भी अधिक सीटें मिल जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इसके साथ ही भाजपा का परचम उत्तराखंड और गोवा में भी लहराएगा। हां प्रजाब का परिणाम जरूर अलग हो सकता है। यहां कांग्रेस के सत्ता में आने की प्रबल संभावना है। हालांकि आम आदमी पार्टी का यहां बहुत कुछ दांव पर लगा है पर सिद्धू फैक्टर के कारण कांग्रेस उस पर भारी पड़ेगी।