बुधवार, 21 सितंबर 2011

बत्तीस दांत और बतीस रुपया

सुना है और सच भी है कि इन्सान के बत्तीस दांत होते हैं । ये दांत चबाने के कम आते हैं। इन्सान इनका प्रयोग कर अपनी भूख शांत करता है। पर हर एक के साथ रहने वाली सरकार ने एक आदमी के लिया बत्तीस रुपये कि खुराक निश्चित कर दी है वह भी लिखित में हलफनामा देकर । अरे जनाब अब तो दूध
भी तीस या बतीस रूपये किलो से कम में नहीं मिलता है । चलिए मन लिया भी लिया कि इतने में एक किलो दूध मिल जायेगा । तो क्या एक आदमी केवल चरणामृत लेकर अपना पूरा महीना गुजार लेगा । भाई लगता है इस सरकार को चलाने वालों को एक आम आदमी से कुछ लेना देना नहीं है। एक आदमी के लिए केवल बतीस रूपये एक महीने के लिए काफी है। यह कहना है भारत सरकार के योजना आयोग का। अब कोई कैसे बताये इन साहबों को कि भाई इतने पैसे में एक किलो दल तक नहीं मिलेगी। लेकिन केवल कागजों पर हर चीज का हिसाब करने वालों को शयद कभी खुद बाजार से खरीदारी नहीं करनी पड़ती है। तभी तो ये मन लेते हैं कि केवल इतने में एक आदमी क महीने भर क खर्च पूरा हो जायेगा। लगता है यह सरकार खुद को दांत समझाने लगी है और आम आदमी को रोटी देने के बदले चबाने की तैयारी करने लगी है। शायद सरकार सोच रही है कि चुनाव तो अभी दूर है और चुनाव आते आते आम आदमी इस तरह पिस जाय कि उसे पिछला कुछ भी याद न रहे और चुनावों के समय कुछ लुभावने वादे कर एकमुश्त उनका वोट ले लिया जाय । लेकिन हर बार आम आदमी को भूलने कि बीमारी नहीं होती और हो सकता है यह बतीस रुपया अगली बार इस सरकार और कोंग्रेस पर भरी पड़े .

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

अन्ना का अनशन

आखिर तीन दिन बाद " माता " जी को दुख पहुँच ही गया । जी हाँ बात अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार को लेकर लड़ाई और उनके अनशन की कर रहा हूँ । पहले चंपुओं ने कहा अन्ना यह काम किसी के बहकावे में आकर कर रहें हैं । फिर कहा अन्ना अपना अनशन तोड़ लें हम तो मानसून सत्र में लोकपाल बिल ला ही रहें हैं। पर जब ७२ साल क बूढा शेर अपनी बात पर डाटा रहा तो मन मनौवल का दौर चलने लगा । एक काबिल मंत्री ने अन्ना के सहयोगियों से बात की । पहले वह चाहते थे कि तुरंत समिति कि घोषणा कर दी जाय पर अन्ना और उनके समर्थकों के जोरदार विरोध के बाद मंत्री जी को कदम वापस खीचने पड़े । जब यह लगा कि अन्ना और उनके लोग जन लोकपाल से कम पर नहीं मानेंगे तब तो मलहम लगाने का काम शुरू हो गया ओउर इसी कड़ी में कांग्रेस अध्यक्ष ने बयां जरी कर कहा कि अन्ना के अनशन से मुझे दुख पहुंचा है ।

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

पूरब कि रौशनी

हाल के महीनों की राजनितिक गतिविधियाँ पूर्वांचल को किसी न किसी रूप में विशेष दर्जा देंती प्रतीत होती हैं । क्या उत्तर प्रदेश के मिशन २०१२ के कुरुक्षेत्र क केंद्र पूर्वांचल होगा । राजनितिक हलचल तो कम से कम यही चुगली कर रहें हैं।
कांग्रेश के मिशन २०१२ के सेनापति और पार्टी महासचिव राहुल गाँधी ने बीते साल सर्दियों में एक रात पूर्वांचल क दिल जितने को जब ट्रेन से गुप्त यात्रा की तो इसे राजनितिक विश्लेषकों ने सामान्य रूप में लिया। कुछ ने तो इसे राहुल क शगल भर करार दिया। समय बीतने के साथ ही इस यात्रा के निहितार्थ समझ में आने लगे हैं। लोकमंच के संयोजक अमर सिंह ने पूर्वांचल स्वाभिमान यात्रा निकल कर राजनितिक दलों को पूर्वांचल के महत्व पर सोचने पर मजबूर कर दिया है। हिन्दू युवा वाहिनी के बैनर तले goraksha peeth ke उत्तराधिकारी और भाजपा संसद योगी आदित्य नाथ की हिन्दू चेतना रैली ने पुन्यांचल नाम से ही सही इस महत्व को और मजबूती प्रदान की है। प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अपने विकास कार्य निरिक्षण दौरे की शुरुआत गोरखपुर से ही कर यह जाता दिया की मिशन २०१२ की शुरुआत बसपा भी यहीं से करेगी और कर मायावती ने पूर्वांचल के समर्थन में प्रतीकात्मक संकेत अवश्य दे दिया है। वर्ष २०११ की शुरुआत में राज्य की मुख्या विरिधि दल सपा ने पूर्वांचल की भावी राजधानी गोरखपुर में अपना राज्य सम्मलेन कर कुछ जताने का प्रयास तो किया ही भले ही सार्वजानिक रूप से पार्टी और उसके नेता पूर्वांचल क विरोध कर रहें हैं। उनका यह सम्मलेन यह बताने के लिया काफी है कि pउर्वंचल और मिशन २०१२ के बीच कुछ न कुछ जरूर है।
उत्तर प्रदेश का पंजाब अर्थात गंगा , जमुना, सरयू, राप्ती और गण्डकी , इन पञ्च नदियों से सिंचित लगभग पांच कोटि कि आबादी वाला यह क्षेत्र अब तक केवल गरीबी और पिछड़ेपन के लिए जाना जाता रहा है। वर्षों से दमन के कारन इन नदियों के तट पर रहने वाले लोग अपने चातुर्य , वीरता , वैराग्य और उपकार कि बातें भूल बैठे । लेकिन इन पांच नदियों का पानी आज दिल्ली , मुंबई कि राजनीति में भी उबाल पैदा करने के लिए काफी है। पूर्वांचल कि गरीबी अब इसके लिए वरदान बन गई गई है। यहाँ के जियालों ने अपनी मिटटी छोड़ खुद के श्रम से हर जगह अपनी पहचान बनायीं । पूरब के लाल एक बार फिर अपनी मिहनत के बलबूते सिरमौर बन कर उभर रहें हैं। उत्तर प्रदेश में ११७ विधान सभाओं में अब केवल पूरब कि मर्जी चलेगी तो साथ ही प्रदेश के कुछ बड़े शहरों कि कई विधानसभाओं में कोई भी रजनीतिक दल पुरबिओं को नजरंदाज नहीं कर सकता ।
अब यह कहना कत्तई गलत नहीं होगा कि पूरब कि अवहेलना यहाँ के आवाम को बर्दाश्त नहीं होगा । पिछले दशक से ही विभिन्न दलों कि सरकारों द्वारा पूर्वांचल निधि के नाम से अलग से बजट देना यह दर्शाता है कि दलों को इस क्षेत्र और यहाँ के वोट बैंक कि चिंता जरूर है। कुल मिला कर स्थितियां बता रहीं हैं कि अब माहौल बदल रहा है । कुछ लोगों और दलों का पूर्वांचल के प्रति सौतेला भाव दिखाई दे रहा है लेकिन अंगडाई लेता पूर्वांचल जब जागेगा तो प्रदेश और देश को एक नयी रौशनी अवश्य देगा।

सोमवार, 3 जनवरी 2011

अब कल से रोज इस ब्लॉग पर आप कुछ न कुछ पठनीय सामग्री पायेंगें । कृपया अपनी टिप्पणियां अवश्य दें। मनोज बाबा।

असमय अतुल जी का जाना

समाचार उद्योग को अतुल जी जैसी सख्शियत फिर कब मिलेगी खुदा जाने । आना और जाना नेचर का नियम है । हम मानव इसे फिहाल रोक पाने में सक्षम नहीं हैं। असमय अतुल जी का जाना ऐसा लगा जैसे अपना कोई सरपरस्त बिन बताये चला गया । मेरी नजर में भाई साहेब का असमय जाना अख़बार जगत को और खुद मुझको एक बड़ा झटका है
समय न मिल पाने के कारण काफी अरसे से ब्लॉग पर कुछ लिख नहीं पा रहा था । पश्चिम की नक़ल में आगे निकल चुका अपना देश नए साल (एक जनवरी ) की खुमारी से उठा था कि आज अचानक दिन के १२ बजे के बाद एक दुखद समाचार मिला । कई sms और फ़ोन से एक दुखद सूचना मिली कि जी या अतुल भाई साहेब नहीं रहे khabar सुनते ही झटका सा लगा पर होनी को कौन टाल सकता है । लेकिन मैं आज जहाँ हूँ वहां तक पहुचने में एक योगदान अतुल भाई साहेब का भी है। बात १९९८ कि है तब मैं हिंदुस्तान पटना में था। अचानक एक दिन तब अमर उजाला कानपुर के संपादक प्रदीप जी के माध्यम से एक सूचना मिली कि तुम दिल्ली जाकर अतुल भाई साहेब से मिल लो। दिली जाने से पहले मैंने अतुल भाई साहेब से बात कि aur उन्होंने मुझे तीन दिन बाद का समय दिया । तीन दिन बाद मैं दिली पहुंचा और भाई साहेब से मिलने आश्रम स्थित उनके दफ्तर पंहुचा। संयोग से उस समय अतुल जी दफ्तर में नहीं थे। गर्द ने कहा भाई साहेब नहीं हैं आज मुलाकात नहीं होगी। फिर मैंने भाई साहेब के घर फ़ोन मिला दिया भाभी जी ने फ़ोन उठाया और कहा कि आप ऑफिस में बैठें भाई साहेब थोड़ी देर से वहां पहुचेंगें । मै इंतजार करने लगा और दो घंटे इंतजार के बाद भाई साहेब आये। पहली बार अख़बार के किसी मालिक से नौकरी के सिलसिले में मिल रहा था था वह भी उनके बुलावे पर। अन्दर से थोड़ी घबराहट थी लेकिन भाई साहेब के पहले वाक्य ने ही मेरा सारा भय दूर कर दिया । यार मनोज जी सॉरी आपको इंतजार करना पड़ा । इसके बाद मैं भाई साहेब के साथ उनके कमरे तक पंहुचा । और फिर जब बातों का सिलसिला सुरु हुआ तो तीन घंटे लग गए। नौकरी तो भाई साहेब ने पहले पांच मिनट में ही दे दी थी बाकी का समय देश के अख़बारों और ख़बरों पर बात होती रही । हालाँकि मैंने उस समय अमर उजाला ज्वाइन नहीं किया पर अब भाई साहेब को मना कैसे करूँ तब एक बार फिर प्रदीप जी ने उपाय बताया और कहा तुम अतुल जी को फ़ोन कर अपनी बात बता दो। मैंने भाई साहेब को फ़ोन किया और अपनी बात बताई तो उन्होंने कहा मनोज कोई बात नहीं हम फिर कभी साथ कम करेंगे और तुम बहुत आगे जाओगे कभी भी दिक्कत हो तो मुझसे मिलना। अतुल जी कि इस बात ने मेरे लिए प्रेरणा का कम किया । लगभग तीन घंटे तक अतुल जी से हुई बातचीत ने मेरे भीतर इतनी उर्जा भरी कि वह अज तक मेरे काम आती है। इसलिए मैं ताउम्र उनका ऋणी रहूँगा । वैसे भी अतुल जी जिस उम्र में सबको छोड़ कर गएँ हैं वह आज के जमाने में किसी के जाने का समय नहीं होता । अतुल जी को अपने अख़बार के लिए , समाज के लिए और पत्रकारों के लिए बहुत कुछ करना था पर कल के द्रूर हाथों ने उन्गें हमसे असमय छीन लिया । हर संसथान को अतुल जी जैसा अभिभावक मिले मेरी भगवन से यही प्रार्थना है। भगवन अतुल बहाई साहेब के परिजनों को यह दुख सहने कि शक्ति दें।