शनिवार, 7 नवंबर 2020

नीतीश पर उन्ही के हथियार से वार

  15 वर्ष के विकास के दावे को एक 31-32 साल के नौजवान  ने  पूरी तरह धराशाई कर दिया।  नौजवान अपनी चुनावी सभाओं में लगातार विकास की पोल खोल तारा और वर्तमान सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं था। हालांकि 2015 में राजद के साथ जाकर नीतीश कुमार ने भी मोदी के खिलाफ यही हथियार उठाया था और भाजपा को मात देकर सफलता पाई थी । नीतीश के  इसी हथियार का उपयोग  5 साल बाद  तेजस्वी ने किया  और इसका परिणाम  10 नवंबर को आपके सामने होगा । हालांकि नीतीश से नाराज भाजपा का एक खेमा  अब  बिहार में भी एकला चलो की बात  कर सकता है । 

यही नहीं  35 साल के दूसरे नौजवान चिरागने तेजस्वी का भरपूर साथ दिया । भले लोजपा महागठबंधन में साझीदार नहीं था पर नीतीश कुमार  जैसे बड़े नेता  को  फिर  बिहार का मुख्यमंत्री न बनने देने को ही उसने अपना मूल एजेंडा बना लिया। वैसे  मतगणना से पहले  यह बात हो सकता है बेमानी लगे  पर  एग्जिट पोल के नतीजे अगर परिणाम में बदलते हैं  तो  नीतीश कुमार की हार का श्रेय  तेजस्वी और चिराग को ही जाएगा ।  हालांकि महागठबंधन का बेहतर समन्वय और एनडीए में अंतर्द्वंद भी इस करारी हार का एक कारण हो सकता है।  बिहार में  एनडीए नीतीश कुमार के नेतृत्व में  चुनाव लड़ रही थी  इसलिए उसकी दूसरी प्रमुख सहयोगी  भाजपा  भी  इस करारी हार का ठीकरा  नीतीश कुमार पर ही फोड़ेगी । बिहार मैं मतदाताओं ने अपनी राय ईवीएम मशीनों में अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को मत दे कर जता दिया है। इन मतों की गिनती का काम 10 नवंबर को पूरा होगा ।

शनिवार को चुनाव के अंतिम चरण के बाद एग्जिट पोल बिहार में एनडीए के हाथ से सत्ता छिटकते हुए दिखा रहे हैं, या फिर दोनों गठबंधनों में कड़े मुकाबले की बात कर रहे हैं। वैसे चुनाव में बिहार जीतने के लिए राजद और महागठबंधन इन दोनों ने अपनी तैयारी कर रखी लेकिन अगर लालू के लाल की सदारत में महागठबंधन राजग को इन चुनावों में पटखनी दे देता है तो यह तेजस्वी को बेहतर चुनाव प्रबंधन और लोगों की नब्ज समझने वाला नेता साबित करता है ।15 साल के सुशासन के दावे को केवल रोजगार का वादा करके इतनी बुरी तरह मात नहीं दिया जा सकता।

 महागठबंधन को मिलने वाले बड़े समर्थन के पीछे गठबंधन के सभी दलों की एकजुटता जमीन पर एक साथ काम करना और उनकी नीतियों में कोई भटकाव ना होना भी शामिल है। बड़ा दल हो या छोटा सब ने तेजस्वी को अपना नेता माना और राजग को मात देने में जी जान से जुट गए। दूसरी ओर राजग का चुनावी प्रबंधन किसी भी रूप में एकजुट नहीं रह सका दो प्रमुख दलों जदयू और भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच 2015 की खाई 2020 में भी पूरी तरह नहीं पट सकी। यही नहीं मुद्दों को लेकर भी इन दोनों दलों के बीच कई जगह मतभेद नजर आए। और तो और चुनावी सभाओं में एक दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं पर सहयोग ना करने की बात भी सार्वजनिक रूप से की गई । ऐसे में भला कोई जीत का दावा कैसे कर सकता है। अगर एग्जिट पोल के आंकड़े अंतिम परिणाम के रूप में सामने आते हैं तो इसका श्रेय केवल और केवल तेजस्वी यादव को दिया जाएगा ।तेजस्वी ने टिकटों के बंटवारे से लेकर सीट शेयरिंग तक के मामले को समय रहते ही सुलझा लिया। जबकि एनडीए में नामांकन के 2 दिन पहले तक वह बहुत असमंजस की स्थिति रही ।यही नहीं कई ऐसी सीटें भी जो भाजपा का गढ़ मानी जाती थी वह जदयू के खाते में गई परिणाम यह हुआ की उन विधानसभाओं के स्थानीय कार्यकर्ता जदयू की जगह किसी दूसरे दल के उम्मीदवार को अपनी पहली पसंद मानकर चलने लगे। रही सही कसर केंद्र में एनडीए की सहयोगी लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान ने पूरी कर दी । भले ही एग्जिट पोलों में उनकी पार्टी को कम सीटें दिखाई जा रही हो पर नीतीश कुमार की इतनी बड़ी हार का सबसे बड़ा कारण चिराग ही बने इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

जनता के मुद्दे पर चुनाव

  बिहार चुनाव का पहला चरण पूरा हो चुका है दूसरे चरण के लिए 3 नवंबर को मतदान होगा ।  प्रदेश के दोनों महत्वपूर्ण गठबंधन पहले चरण में अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। जनता ने किस को आशीर्वाद दिया यह तो 10 नवंबर को पता चलेगा लेकिन यह तय हो गया है बिहार में अब चुनावी मुद्दे तेजी से बदल रहे हैं । लोगों को रोजगार देने का दांव खेलकर  राजद के चुनावी कप्तान तेजस्वी ने एनडीए को गंभीर चुनौती दी तो भाजपा ने भी नौकरियों सहित 19 लाख रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की बात कहकर प्रदेश के युवा मतदाताओं को लुभाने की चाल चल दी ।  इस तरह की चुनाव में रोज मुद्दे बदल रहे हैं अब राजनीतिक दल नहीं बिहार में इस बार आम जनता चुनावी मुद्दा सेट करने में सबसे आगे है।

चुनावी समीकरणों की बात करें तो राजद प्रदेश भर में लालू यादव के पुराने माई समीकरण को साधने में जुटा हुआ है । कुछ हद तक उसे इस मामले में सफलता भी मिली है । हां सीमांचल इलाके में असदुद्दीन और पप्पू यादव की उपस्थिति राजद के समीकरण को अच्छी खासी प्रभावित कर सकती है । दूसरी ओर एनडीए के गठबंधन जदयू का सारा जोर महादलित और पिछड़े वर्ग पर है ।भारतीय जनता पार्टी अगड़ों समेत पिछड़ों को साधने में जुटी है ।अब यह तय हो चुका है कि बिहार में चुनाव तो विकास और रोजगार के मुद्दे पर ही प्रमुख रूप से लड़ा जाएगा। बावजूद इसके कई सीटों के परिणाम जातीय समीकरणों , विभिन्न दलों के बागियों और लोजपा,  रालोसपा , जाप तथा कुछ अन्य छोटे दलों द्वारा काटे गए वोटों पर भी निर्भर करेगा। 

हर दावे के बावजूद बिहार में हर सीट पर कांटे की टक्कर दिख रही हैं इसलिए चुनाव परिणाम  भी पुराने पूर्वानुमानोंं को ध्वस्त कर सकता है । जहां तक मतदाताओं की बात है तो पहले चरण में भी और उसके बाद के चरणों में भी लगभग 25 फ़ीसदी मतदाताओं ने किसको मत देना है यह निर्णय मतदान के दिन लिया। इसलिए उनके मन में क्या है यह तो वोट पड़ जाने के बाद ही पता चलेगा । मुझे 2015 का चुनाव याद आ रहा है इस चुनाव में भाजपा अपनी जीत के प्रति अति उत्साह में थी और उसका परिणाम सब ने देखा । इस बार भी राजद के कप्तान तेजस्वी अति उत्साह में है कहीं उनका भी हाल 2015 वाली भाजपा का ना हो जाए।

रविवार, 25 अक्टूबर 2020

चिराग की लौःः ताकत कहां से

 आज लोजपा प्रमुख चिराग पासवान बिहार चुनाव को लेकर 2 अहम बयान दिए हैं । पहला यह कि जहां लोजपा के उम्मीदवार नहीं है वहां उनके समर्थक भाजपा को वोट दें । दूसरा कि अगर उनकी सरकार बनी तो लोजपा नीतीश कुमार को जेल भेजेगी। उन्होंने खुलेआम आरोप लगाया कि नीतीश राज में बिहार में विकास नहीं भ्रष्टाचार हुआ है । अगर हम सरकार में आए तो इसकी जांच कराएंगे और नीतीश को जेल भेजेंगे । आखिर यह चिराग किसकी लौ से इतना फफक रहा है , उसके अंदर की कहानी क्या है आइए जानते हैं बाबा की जुबानी 

 यह तथ्य सही है कि बिहार में सभी मुद्दों पर इस समय एंटी इनकंबेंसी लहर पूरी भारी पड़ रही है । कोरोना काल के दौरान राज्य सरकार द्वारा बिहार के श्रमिकों को वापस बुलाने में की गई कोताही और इस दौरान आम लोगों को हुई असुविधा के कारण राज्य सरकार से लोगों की नाराजगी कुल मिलाकर लगभग हर जगह दिख रही है। यह बात अलग है कि यह नाराजगी एनडीए गठबंधन के विरोध में  मतदान केंद्रों पर निकलेगी या फिर केंद्र की मोदी सरकार द्वारा को रोना काल में दिए गए सहायता के कारण रुक जाएगी यह कहा नहीं जा सकता। चिराग और उनके सलाहकार इसी थ्योरी पर चुनाव प्रचार में जुटे हैं। उनके सलाहकारों का मानना है की राज्य सरकार ने कोरोन काल के दौरान लोगों के साथ सहानुभूति नहीं बरती और इसी नाराजगी को भुनाने के लिए चिराग प्रदेशभर का तूफानी दौरा कर रहे हैं । सड़क मार्ग से दौरा के बाद अब चिराग के लिए हेलीकॉप्टर की भी व्यवस्था कर ली गई है ताकि वह अधिक से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में अपनी बात लोगों के समक्ष रख सकते हैं।

 केवल चिराग ही नहीं राजद के नेतृत्व वाला महागठबंधन भी इस चुनाव में विकास को ही मुख्य मुद्दा बनाए रखना चाहता है ।हर जगह वह नीतीश सरकार को इसी मुद्दे पर घेरने की फिराक में है राजद और उसके सहयोगी दल स्थानीय स्तर पर मोदी के विरुद्ध कुछ ना बोल कर केवल नीतीश कुमार पर तीखा हमला बोल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध मोर्चा खोलने का काम इस गठबंधन में राहुल गांधी को दे रखा है। दूसरी ओर प्रगतिशील गठबंधन के साझीदार ओवैसी केंद्र पर हमला बोलकर केंद्र विरोधी वोट अपने खेमे में करने में जुटे हैं । ऐसे में चिराग को लगता है कि बस स्थानीय मुद्दों को उठाकर है चुनावी सफलता पाई जा सकती है । इसके साथ साथ भाजपा के नाराज  कार्यकर्ता और संघ के कुछ वर्ग का अंदरूनी समर्थन भी कि चिराग कौ मिलता दिख रहा है । जिसके कारण ही चिराग की लौ बिहार में तेजी पकड़ रही है। हालांकि 10 नवंबर को यह लौ कहां तक पहुंचेगी यह तो समय ही बताएगा। लेकिन इस चुनाव में तेजस्वी से अधिक राजग  खासकर नीतीश कुमार का नुकसान चिराग पासवान कर रहे हैं।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

किसको खाक करेंगे चिराग

 चिराग पासवान अपने चिराग से  किसका घर जलाएंगे किसका घर बचाएंगे अब लोगों की नजर  इस पर टिकी हुई है । यह भी संभव है  कि खुद जलकर  दूसरे को  खाक करने में चिराग सफल हो जाएंं  या फिर  खुद जल जाएंं  और उसकी लौ  दूसरे पर कुछ असर भी ना कर पाए । बिहार चुनाव पहले चरण का मतदान मैं 4 दिन का समय शेष रह गया है । दोनों गठबंधन अपना पूरा जोर मतदाताओं को रिझाने में लगा रहे हैं कुल मिलाकर लगता है कि यह चुनाव भी विकास के मुद्दे पर ही केंद्रित रहेगा । राजद की अगुवाई वाला गठबंधन नीतीश की अगुवाई वाले एनडीए को इसी विकास के मुद्दे पर घेरने में लगा है उसके तरकस में बेरोजगारी , पलायन , शिक्षा ,स्वास्थ्य आदि जैसे मुद्दे हैं। इसके जवाब में एनडीए पिछले 15 सालों में किए गए अपने विकास कार्यों को गिना रहा है ।और साथ ही साथ उसके पहले के 15 सालों में लालू प्रसाद के राज के दौरान बिहार की बिगड़ी हुई स्थिति की याद मतदाताओं को दिला रहा है । अब मतदाता कितना याद रखेंगे कितना नहीं या तो 28 अक्टूबर के पहले चरण के मतदान के दिन समझ में आएगा। इन सबके बावजूद तमाम विश्लेषक व बिहार की राजनीति के जानकार यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि एनडीए को जो भी घाटा होगा वाह नीतीश सरकार के एंटी इनकंबेंसी लहर के कारण संभव है । हालांकि चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी के इंट्री इस लहर को कुछ हद तक रोकने में कामयाब हो सकती है । इसके साथ ही विभिन्न जनसभाओं में नितीश कुमार का छोटी-छोटी बातों पर झुझुलाना  इस बात की ओर संकेत करता है कि वह खुद अपने उपलब्धियों से पूरी तरह  मुतमइन नहीं है । इस तरह से छोटी-छोटी बातों पर मंच से जनता को जवाब देना कहीं उनके प्रत्याशियों पर भारी न पड़ जाए । एक और बाधा नीतीश की राह में खड़ी है वह है लोजपा के साथ जुड़े भाजपा के वैसे नेता जिनके संघ से गहरे संबंध रहे हैं। इन नेताओं के लिए खुले तौर पर ना सही लेकिन अंदरखाने संघ के लोग मैदान में लगे हुए हैं । वैसे भी लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान ने एक मिशन बना लिया है कि उनका उद्देश्य केवल नीतीश कुमार को हराना है । अपनी चुनाव सभाओं में वह नीतीश कुमार पर काम ना करने का आरोप लगाते हैं । दूसरी ओर भाजपा के बारे में कुछ नहीं कहते हैं । इसका लाभ भाजपा को तो मिल सकता है लेकिन गठबंधन को को चिराग के इन बयानों से घाटा ही मिलेगा ।  अब चिराग अपने मकसद में कहां तक सफल होंगे यह निर्णय तो 10 नवंबर को परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020

बिहार चुनावः पत्ते खुले मुट्ठी बंद



 बिहार चुनाव अपने रंग में आने लगा है। मुकाबले में जुटे दोनो बड़े गठबंधन और उनके नेता अब अपने पत्ते खोलने लगे हैं ।सभी दलों का घोषणा पत्र जारी हो चुका है । सब के पत्ते खुल गए हैं  लेकिन  वोट देने वालों ने  फिलहाल अपनी मुट्ठी बंद कर रखी है । दोनों गठबंधन  अपनी अपनी प्रभावशाली जीत का दावा कर रहे हैं  और एक दूसरे पर  बिहार को बर्बाद करने का आरोप भी लगा रहे हैं ।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बिहार में चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है तो दूसरी ओर कांग्रेस के नेता राहुल गांधी भी चुनाव प्रचार में जुट गए हैं ।प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो राहुल गांधी के साथ राजद नेता तेजस्वी यादव मंच पर साथ दे रहे हैं ।जैसे-जैसे चुनाव की तिथियां नजदीक आ रहींं हैं वैसे वैसे चुनावी गतिविधियां तेजी पकड़  रही है। हालांकि तमाम सर्वेक्षण के मुताबिक एनडीए गठबंधन एक बार फिर सरकार बना सकता है । दोनों गठबंधन अपनी अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रहे हैं और तरह-तरह के दावे कर रहे हैं सच बात यह है कि इस बार बिहार क्या परिणाम देगा यह 10 नवंबर को ही पता चलेगा लेकिन लोजपा के चिराग पासवान रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा जन अधिकार पार्टी के पप्पू यादव और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी इस गठबंधन को कहां और कितना नुकसान पहुंचाएगी जीत और हार का सारा दारोमदार इस पर भी निर्भर करेगा ।राज्य में एंटी इनकंबेंसी भी दिख रही है हालांकि नरेंद्र मोदी के प्रभाव के कारण इस पर कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है ।प्रदेश में युवा परेशान हैंं रोजगार की कमी है कोरोना संकट के कारण व्यापार भी मंदी की मार झेल रहा है ऐसे में बिहार की जनता क्या निर्णय देगी यह तो 10 नवंबर को है पता चलेगा। लेकिन कहीं नीतीश  के प्रति नाराजगी एनडीए को भारी ना पड़े । बावजूद इसके यह हर कोई मान रहा है इस चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी दूसरे स्थान के लिए जदयू और राजद में लड़ाई होगी । सहानुभूति की लहर पर सवार लोक जनशक्ति पार्टी कुछ सीटें सकती हैं लेकिन या आंकड़ा अधिकतम 10 तक ही हो सकता है । यह जरूर है कि लोजपा कई विधानसभा क्षेत्रों में जदयू के उम्मीदवारों को नुकसान पहुंचा सकती है । इसी तरह पप्पू यादव और उपेंद्र कुशवाहा का गठबंधन राजद को कई विधानसभाओं में नुकसान पहुंचा सकता है।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

 नीतीश से नाराजगी कहींं भारी न पड जाय


बिहार चुनाव के परिडाम तो 10 नवंंबर को आयेंगें  पर अभी जमीनी हालात किसी एक गठ्बंधंन  के पक्ष में नहीं दिख रहे । विपक्ष नीतीश  सरकार की नाकामी को जोर शोर से भुनाने में लगा ह?