बिहार चुनाव का पहला चरण पूरा हो चुका है दूसरे चरण के लिए 3 नवंबर को मतदान होगा । प्रदेश के दोनों महत्वपूर्ण गठबंधन पहले चरण में अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। जनता ने किस को आशीर्वाद दिया यह तो 10 नवंबर को पता चलेगा लेकिन यह तय हो गया है बिहार में अब चुनावी मुद्दे तेजी से बदल रहे हैं । लोगों को रोजगार देने का दांव खेलकर राजद के चुनावी कप्तान तेजस्वी ने एनडीए को गंभीर चुनौती दी तो भाजपा ने भी नौकरियों सहित 19 लाख रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की बात कहकर प्रदेश के युवा मतदाताओं को लुभाने की चाल चल दी । इस तरह की चुनाव में रोज मुद्दे बदल रहे हैं अब राजनीतिक दल नहीं बिहार में इस बार आम जनता चुनावी मुद्दा सेट करने में सबसे आगे है।
चुनावी समीकरणों की बात करें तो राजद प्रदेश भर में लालू यादव के पुराने माई समीकरण को साधने में जुटा हुआ है । कुछ हद तक उसे इस मामले में सफलता भी मिली है । हां सीमांचल इलाके में असदुद्दीन और पप्पू यादव की उपस्थिति राजद के समीकरण को अच्छी खासी प्रभावित कर सकती है । दूसरी ओर एनडीए के गठबंधन जदयू का सारा जोर महादलित और पिछड़े वर्ग पर है ।भारतीय जनता पार्टी अगड़ों समेत पिछड़ों को साधने में जुटी है ।अब यह तय हो चुका है कि बिहार में चुनाव तो विकास और रोजगार के मुद्दे पर ही प्रमुख रूप से लड़ा जाएगा। बावजूद इसके कई सीटों के परिणाम जातीय समीकरणों , विभिन्न दलों के बागियों और लोजपा, रालोसपा , जाप तथा कुछ अन्य छोटे दलों द्वारा काटे गए वोटों पर भी निर्भर करेगा।
हर दावे के बावजूद बिहार में हर सीट पर कांटे की टक्कर दिख रही हैं इसलिए चुनाव परिणाम भी पुराने पूर्वानुमानोंं को ध्वस्त कर सकता है । जहां तक मतदाताओं की बात है तो पहले चरण में भी और उसके बाद के चरणों में भी लगभग 25 फ़ीसदी मतदाताओं ने किसको मत देना है यह निर्णय मतदान के दिन लिया। इसलिए उनके मन में क्या है यह तो वोट पड़ जाने के बाद ही पता चलेगा । मुझे 2015 का चुनाव याद आ रहा है इस चुनाव में भाजपा अपनी जीत के प्रति अति उत्साह में थी और उसका परिणाम सब ने देखा । इस बार भी राजद के कप्तान तेजस्वी अति उत्साह में है कहीं उनका भी हाल 2015 वाली भाजपा का ना हो जाए।


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