चिराग पासवान अपने चिराग से किसका घर जलाएंगे किसका घर बचाएंगे अब लोगों की नजर इस पर टिकी हुई है । यह भी संभव है कि खुद जलकर दूसरे को खाक करने में चिराग सफल हो जाएंं या फिर खुद जल जाएंं और उसकी लौ दूसरे पर कुछ असर भी ना कर पाए । बिहार चुनाव पहले चरण का मतदान मैं 4 दिन का समय शेष रह गया है । दोनों गठबंधन अपना पूरा जोर मतदाताओं को रिझाने में लगा रहे हैं कुल मिलाकर लगता है कि यह चुनाव भी विकास के मुद्दे पर ही केंद्रित रहेगा । राजद की अगुवाई वाला गठबंधन नीतीश की अगुवाई वाले एनडीए को इसी विकास के मुद्दे पर घेरने में लगा है उसके तरकस में बेरोजगारी , पलायन , शिक्षा ,स्वास्थ्य आदि जैसे मुद्दे हैं। इसके जवाब में एनडीए पिछले 15 सालों में किए गए अपने विकास कार्यों को गिना रहा है ।और साथ ही साथ उसके पहले के 15 सालों में लालू प्रसाद के राज के दौरान बिहार की बिगड़ी हुई स्थिति की याद मतदाताओं को दिला रहा है । अब मतदाता कितना याद रखेंगे कितना नहीं या तो 28 अक्टूबर के पहले चरण के मतदान के दिन समझ में आएगा। इन सबके बावजूद तमाम विश्लेषक व बिहार की राजनीति के जानकार यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि एनडीए को जो भी घाटा होगा वाह नीतीश सरकार के एंटी इनकंबेंसी लहर के कारण संभव है । हालांकि चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी के इंट्री इस लहर को कुछ हद तक रोकने में कामयाब हो सकती है । इसके साथ ही विभिन्न जनसभाओं में नितीश कुमार का छोटी-छोटी बातों पर झुझुलाना इस बात की ओर संकेत करता है कि वह खुद अपने उपलब्धियों से पूरी तरह मुतमइन नहीं है । इस तरह से छोटी-छोटी बातों पर मंच से जनता को जवाब देना कहीं उनके प्रत्याशियों पर भारी न पड़ जाए । एक और बाधा नीतीश की राह में खड़ी है वह है लोजपा के साथ जुड़े भाजपा के वैसे नेता जिनके संघ से गहरे संबंध रहे हैं। इन नेताओं के लिए खुले तौर पर ना सही लेकिन अंदरखाने संघ के लोग मैदान में लगे हुए हैं । वैसे भी लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान ने एक मिशन बना लिया है कि उनका उद्देश्य केवल नीतीश कुमार को हराना है । अपनी चुनाव सभाओं में वह नीतीश कुमार पर काम ना करने का आरोप लगाते हैं । दूसरी ओर भाजपा के बारे में कुछ नहीं कहते हैं । इसका लाभ भाजपा को तो मिल सकता है लेकिन गठबंधन को को चिराग के इन बयानों से घाटा ही मिलेगा । अब चिराग अपने मकसद में कहां तक सफल होंगे यह निर्णय तो 10 नवंबर को परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा
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