गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

दाग अच्छे हैं


2जी घोटाला मामले में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने सभी 25 आरोपियों को बरी कर दिया है। इस पैसले से कांग्रेस का खुश होना लाजिमी है। उसका मानना है कि इस फैसले ने उसपर लगा एक बड़ा दाग धो दिया । पर अभी उसकी खुशी वैसी ही है जैसे चलो भाई ये दाग है तो दाग ही अच्छे है। फसले के खिलाफ उपरी अदालते क्या निर्णय देंगी यह तो भविष्य के गर्भ में है। पर यह खुशी कुछ दिन की खुशी होगी या फिर स्थाई यह कहना अभी मुश्किल है।
कल तक इस मुछ्दे पर रक्षात्मक रुख रखने वाली कांग्रेस के नेता एकाएक हमलावर होने लगे हैँ।  गुलाम नबी आजाद कहते है कि जिस घोटाले की वजह से यूपीए 2 की सरकार चली गई वह घोटाला हुआ ही नहीं। पूर्व पीएम मनमोहन सिंह  जो हमेशा चुप रहने के लिए जाने जाते है वह भी इस फैसले पर चहक उठे और कहा 'मेरे खिलाफ किया गया दुष्प्रचार निराधार साबित हुआ।
 जीरो लॉस का सिद्धांत देने वाले पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्‍बल तो  बल्लियों उछलने लगे  । उन्होंने सरकार को ललकारते हुए कहा कि हमारा 'जीरो लॉस' का दावा सिद्ध हो गया है, जिन लोगों ने उन पर आरोप लगाए उन्हें माफी मांगनी चाहिए। 'आज मेरी बात सिद्ध हो गई, कोई घोटाला नहीं, कोई घाटा नहीं। अगर घोटाला है तो, झूठ का घोटाला है, विपक्ष और विनोद राय के झूठ का।  और तो और सिब्बल ने विनोद राय से पूरे  देश के सामने माफी मांगने की मांग भी कर डाली।
जािहर है सरकार की ओर से इसका जवाब उाना था और आया भी। कांग्रेस की बौछारों का सामना करने आये वित्त मंत्री अरुण जेटली।
अपने आरोपों पर पूरी तरह कायम रहते हुए  उन्होंने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा इस फैसले को कांग्रेस सममान पत्र की तरह लहरा रही है।  उन्होंने यूपीए की स्पेक्ट्रम आवंटन नीति को पूरी तरह भ्रष्ट करार देते हुए  2012 में सुप्रीम कोर्ट के पैसले का हवाला भी दिया।  यही नहीं लगे हाथ आंकड़ो से उन्होने कांग्रेस को घेरा और कह कि जिस स्पेक्ट्रम पर पहले 1734 करोड़ मिल रहे थे 2015 में 1.10 लाख करोड़ रुपए मिले।
यह तो रही फैसले पर राजनीति की बात। अब इसके दूसरे पहलू पर गौर करते हैं। विशेष जज का दर्द यह है कि वह सात साल तक सबूतों का इंतजार करते रहे । कोई सबूत ले कर नहीं आया। मंशा जज साहब पर शक करने या फैसले पर उंगली उठाने की नहीं है। लेकिन मन में एक सवाल तो उठता ही है कि फिर सुप्रीम कोर्ट ने किस सबूत के आधार पर लाइसेंस रद्द किए थे। क्या विशेष जज महोदय ने इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। मैं न कानून का जानकार हु नही उसका विश्लेषक पर एक सवाल तो मन में उठता ही है कि जिस सबूत पर सुप्रीम कोर्ट ने लाइसेंस रद्द किए क्या वे नाकाफी थे। यदि हां  तो फिर तो यह गंभीर मामला है और नहीं तो फिर आज का पैसला।
यूपीए 2 की सरकार पर लगा यह एक बड़ा दाग तो है ही । जब कैग ने उंगली उठाई थी इस सरकार के मुखिया चुप थे। अगर आवंटन गलत था तो ए राजा को मंत्रिमंडल से बाहर क्यों किया गया। सरकार के कई कृत्यों खुद ही घोटाले का संदेह पैदा किया। रही सही कसर सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान दिए गये लाइसेंसों को रद्द कर पूरी कर दी। कोर्ट के आदेश पर ही मामले की सुनवाई विशेष अदालत में की गई। इस मामले में पराजित पक्ष सीबीआई का कहना है कि कोर्ट ने लिखित सबूतों पर मौखिक सबूतों को बरीयता दी। उसका कहना है कि वह इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देगी। अगर उस समय यह फैसला उलट गया तो  जो आज दाग मिटने की बात कर रहें हैं तब क्या कहेंगे।
बाकी तो दाग अच्छे हैं और अच्छे रहेंगे।





बुधवार, 20 दिसंबर 2017

ये नैतिक जीत क्या है भाई

राजनीति भी अजीब चीज है। एक ही बात पर हर पक्ष के अलग-अलग तर्क हैं। गुजरात और हिमाचल में चुनाव संपन्न हुए , परिणाम भी आ गये। दोनों जगह चिर प्रतिद्वदी पार्टियां आमने सामने थीं। चुनाव के दौरान दोनों ने बढ़चढ़ कर दावे किए। अंतिम परिणामों ने दोनों के दावों की पोल खल दी। भाजपा प्रधानमंत्री की साख के बल पर गुजरात में सरकार बचा ले गई। यहां भाजपा को जीत का तोहफा देकर भी गुजरात की जनता ने सबक दे दिया कि सत्ता पाकर अहंकार में न आओ। जनता आपकी समर्थक हो या न हो उसकी बात आपको सुननी होगी। आप शाशक हैं तो उनके दुख दर्द में आपको भागी बनना ही होगा। हां एक बात जरूर यदि भाजपा इसे चेतावनी के रूप में नहीं लेती है तो आगे उसके लिए मुश्किलें बढ़ सकतीं हैं।
वैसे एक बात जरूर है कि कई तरह की अड़चनों , विरोध और प्रचार दुश्प्रचार के बावजूद भाजपा गुजरात में छठी बार सरकार बनाने में सफल रही। पिछले कार्यकाल के मुकाबले उसके सदस्यों की संख्या कम जरूर हुई पर चुनावी जंग में बाजी वही जितता है जो अधिक मेहनत करता है। तय है कि भाजपा ने अधिक मेहनत की और बाजी उसके हाथ लगी।
अब कांग्रेस यहां अपनी हार को नैतिक जीत बता रही है।  उसका दावा है कि गुजरात के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए बड़ा झटका है। पहली बात तो यह कि हार हार होती है। राजनीति खुद नीति है इसलिए नैतिक का मतलब क्या। कांग्रेस को माना पड़ेगा कि उसकी हार हुई है । उसने वह प्रयास नहीं किया जो कहीं जीत के लिए किया जाना चाहिए था। कांगेस अध्यक्ष का नैतिक जीत वाला बयान तो वैसा ही है जेसा कोई बच्चा  फेल होने के बाद यह गिनाना शुरू कर देता है कि उसके साथ पढ़ने वाले फलां फलां भी फेल हो गये है। 22 साल के सत्ता विरोधी लहर को ठीक से न भुना पाना कोंग्रेस की सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी रही। भाजपा की रणनीति के आगे उसके प्रयास छोटे हो गये और परिणाम कांग्रेस लोगों केगुस्से को अपनी जीत में न बदल सकी। यही नहीं गुजरात की बात और वहां नैतिक जीत की बात करने वाली कांग्रेस हिमाचल को भूल जाती है। चुनाव से पहले यहां कांग्रेस की सरकार थी। भाजपा तो गुजरात में अपनी 22 साल पुरानी सरकार बचाले गई पर कांग्रेस अपनी पांच साल पुरानी सरकार भी न बचा सकी। यही नहीं वहां तो उसके खेवनहार बीरभद्र सिंह ने पाटीं की हार के लए अपरोक्ष रूप से आलाकमान को जिम्मेदार ठहरा दिया। यहां कांग्रेस की नैतिकता कहां चली गई पता नहीं।
गुजतात और हिमाचल के परिणाम कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए सबक है। अब कौन इससे कितना सीखता है यह तो भविष्य के गर्भ में है।  हार को हार की तरह लेना बीरता होती है पर उसमें दूसरे की भी हार ढूंढना कायरता।

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

गुजरात 18 को कई अनुमान ध्वस्त होगे



आज यानि 12 दिसंबर को गुजरात में दूसरे और अंतिम चरण का प्रचार समाप्त हो गया। हर कोई अपनी-अपनी जीत का दावा करने में जुट गया है। पहले चरएा में 9 दिसंबर को मतदान हुआ था । कुल 65 से 67 प्रतिशत मतदान की बात हुई। अगला चरण 14 को होगा कितना मत पड़ेगा यह भविष्य के गर्भ में है। 18 को दोपहर तक परिणाम भी आ जाएगा।
पार्टियां जीत के दावे कर रहीं हैं वह तो ठीक है पर भाजपा और कांग्रेस के खेमें में बँटे पत्रकार जो गुजरात की जमीनी हकीकत का क ख ग घ भी नहीं जानते हैं अपनी अपनी भविष्यवाणी करने में जुट गये हैँ। यह सच है कि नरेद्र मोदी के लिए यह चुनाव सबसे कठिन है पर कांग्रेस नेतृत्व की अपरिपक्वता ने उन्हें फिर मौका दे दिया है। मैं भविष्यवक्ता नहीं हूं पर जो थोड़ी बहुत राजनीतिक समझ रखता हूं उसके अनुसार हिमाचल और गुजरात में  भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ सकती है। गुजरात में हार्दिक, मेवानी और जिग्नेश की त्रयी राहुल गांधी के साथ मिलकर जो चतुष्टाकक बनाया है उसका कमाल मोदी मैजिक को कितना कम कर सकता है आंकड़े इस पर निर्भर करेंगे।  मोदी ने अपने गृह राज्य में गुजरात अस्मिता की बात कर 10 से 15 प्रतिशत भाजपा के मतो का मार्जिन वैसे ही बढ़ा लिया है। रही सही कसर राहुल के मंदिर पिरक्रमा ने पूरी कर दी है। वास्तव में कांग्रेस ने गुजरात चुनावों में मोदी को मात देने की सटीक योजना बनाई थी। इसके तहत अपने को मुस्लिम मतो की ओर से तटस्थ रखकर हिन्दुओं को लुभाने की योजना बनाई थी। उनका मानना था कि मुस्लिम मत तो अपने हैं ही अब मंदिरों का रूख कर हिंदू मतो में सेंध लगाई जाय। पर उनकी इस योजना को खुद उन्हीं के लोगों ने सोमनाथ तक जाते जाते पलिता लगा दिया। विकास के नाम पर भाजपा को चुनौती देने निकले राहुल गांधी भाजपा की चाल में फंस गये और मंदिरों के चक्कर लगाने लगे। मैं यह नहीं कहता कि इससे  कांग्रेस का अल्पसंख्क आधार खत्म हो जाएगा पर इसका प्रतिकूल असर  उस वोट बैंक पर जरूर पड़ेगा जिसे कांग्रेस दशकों से अपना मानते आई है। हां एक बात और वाकई अगर गुजरात की जनता 22 साल के भाजपा शासन से उब गई है तब तो परिणाम  क्या होगा मैं इसका आंकलन करने में सक्षम नहीं हूं । परिणाम जो भी हो यह तय है कि कड़े मुकाबले वाली बात नहीं होगी परिणाम एकतरफा होगा। और इसमें फिलहाल भाजपा बढ़त लेते हुए दिख रही है।
यह सही है कि भाजपा के पास गुजरात में स्थानीय स्तर पर कोई चेहरा नहीं है पर कांग्रेस भी तो राज्य स्तर पर कोठ्र विकल्प नहीं दे पाई । अलबत्ता हार्दिक, अल्पेश और मेवानी को तरजीह देकर उसने अपने स्थापित क्षत्रपों को नाराज जरूर किया है। यह नाराजगी भले ही सामने न आई हो पर इसका असर चुनाव परिणामों पर जरूर पड़ेगा।
इंतजार कीजिए 18 दिसंबर का जब परिणाम आएंगे।  कई अनुमान ध्वस्त होंगे । कई व्याख्याएं धराशाई होगी। विद्वानों की बोलती बंद होगी तो कई अपनी बात से पलटते नजर आएंगे और दावा करेंगे कि मैने तो यह कहा था मैने तो वह कहा था। रही बात कांग्रेस की तो उसके पास तो पहले से जवाब तैयार है। उसके तमाम नेता एक स्वर से कहेंगे राहुल जी को इसका दोष कैसे दे सकते है। डनहोंने तो कमान हार्दिक और टीम को सौंप दी थी। हमने आंकलन में गलती की। हो यह जरूर होगा कि अगर कांग्रेस की सीटें बढ़ी, जिसकी संभावना है तो सब चिल्लाएंगे देखा राहुल जी की मेहनत का कमाल । हम भले ही जीत ना पाए पर मोदी को उनके गढ़ में घेर जरूर लिया। सीटों की बढ़त 5 से 7 सीटों तक सँभव है।हां यदि गुजरात का परिणाम कंग्रेस के पक्ष में गया तो यह मान लीजिए कि यह मोदी राज के अवसान की शुरूआत होगी और देश के राजनीतिक क्षितिज पर राहुल नाम के खानदानी तारे के उदय का प्रबल संकेत। वैसे इसकी संभावना कम है फिर भी राजनीति में कब क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता ।
वाकी 18 को...

खबरिया चैनल क्यों देखें?



सुबह हो या शाम। जब भी टीवी खोलो कुछ स्वनामधन्य विद्वान चैनलों पर  एक दूसरे के ऊपर खखुआते नजर आ जाते हैं। इसे देखकर लगता है कि खबरिया चैनलों से तो अच्छा है  तारक मेहता का उल्टा चश्मा या कोई और सीरियल वाला चैनल देख लो । इसमें कमसे कम यह तो पता ही रहता है कि यह नौटंकी है। पर खबर वाले तो खबर के नाम पर नौटंकी फलाते हैं।
वैसे भी इन खबरिया चैनलों के कर्ताधर्ता क्या करें ।  मालिक तो टीआरपी देखता है। टीआरपी विना नौटंकी के बढ़ नहीं सकती । एक और बात सबसे अलग दिखने की चाहत भी इन चैनलों को ऊलूल-जुलूल करने पर मजबूर कर देती है। अब देखिए खबरिया चैनल एक एैसे कथित नेता केबयान को ब्रेकिंग कह कर चलाने लगते हैं कि मशरूम खने से आदमी गोरा हो जाता है। और तो और यह मशरूम अस्सी हजार रुपये किलो बिकती है और ताइवान से आती है। दर्शक मूर्ख बनते रह और चैनल ब्रेकिंग चलाते रहे।  अरे भाई ब्रेकिंग के चक्कर में दूसरों का विश्वास न तोड़ो कम से कम कोई क्या बोल रहा है वह सत्य है कि नहीं इसकी तो छानबीन कर लो।
इसी तरह का दूसरा उदाहरण। जो आदमी नाबालिग होने के कारण चुनाव नहीं लड़ पा रहा है वह गुजरात चुनावों में मोदी और राहुल गांधी से इन चैनलो पर अधिक समय और जगह पा रहा है। गुजरात के  विकास के रोडमैप पर बात करने के लिए  सबसे पहले समय मिल जाए इसकी होड़ चैनलों में लगी रहती है।  अगर विकास के रोड मैप की बात ही करनी थी तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से बात करते, सैम पित्रोदा को बुलाते । लेकिन क्या करे मनमोहन सिंह और पित्रोदा टीआरपी नहीं दे सकते वह तो हार्दिक से ही मिलेगी। और दर्शक बेचारा क्या करे कहीं कोई काम की खबर मिल जाए इसके चक्कर में  इन ..आपों को झेलता रहता है।
कल गुजरात चुनाव खत्म हो जाएगा और शाम 6 बजे के बाद ये चैनल भारी भरकम लेकिन टुटपूंजिए राजनीतिक विश्लेष्क परिणम से पहले ही मंत्रिमँडल गठन करते नजर आएंगे। मोदी समर्थक विद्वान इसे मोदी का करिश्मा बताएंगे तो राहुल के समर्थक इसे राहुल का चमत्कार । कुछ इसे हार्दिक ,जिगनेश और अल्पेश की लड़ाई की जीत या फिर उनकी कमजोरी कहां रह गई इसका बखान करेंगें। जबकि आम दर्शक को इससे कोई मतलब नहीं रहता है।
यह तो रही गुजरात चुनाव की बात । ले दे के 18 को इसका शेर थम जाएगा । पर खबरिया चैनल चुनावी मोड से बाहर नहीं आ पाएंगे। भाजपा की तीत पर सब चैनल शुरू हो जाएंगे  2019 में कोई नहीं है टक्कर में । परिणाम भाजपा के पक्ष् में नहीं रहा तो सब चिललाना शुरु कर देंगे यह राहुल के अभ्युदय का समय है। पैनल में बैठे लोग अपने-अपने हिसाब से तर्क गढ़ कर अगले आम चुनावों में जीत हार की भविष्यवाणी करने में जुट जाएंगे। अरे भाई अगर यही देखना और सुनना है तो फिर क्यों न शुद्ध नौटंकी देखी जाए ।  विद्वानों की नौटकीं देखने से तो अच्छा है जो नौटंकी करने हैं उनको देख जाए कम से कम उनका हौसला तो बढ़ेगा।