बुधवार, 20 दिसंबर 2017

ये नैतिक जीत क्या है भाई

राजनीति भी अजीब चीज है। एक ही बात पर हर पक्ष के अलग-अलग तर्क हैं। गुजरात और हिमाचल में चुनाव संपन्न हुए , परिणाम भी आ गये। दोनों जगह चिर प्रतिद्वदी पार्टियां आमने सामने थीं। चुनाव के दौरान दोनों ने बढ़चढ़ कर दावे किए। अंतिम परिणामों ने दोनों के दावों की पोल खल दी। भाजपा प्रधानमंत्री की साख के बल पर गुजरात में सरकार बचा ले गई। यहां भाजपा को जीत का तोहफा देकर भी गुजरात की जनता ने सबक दे दिया कि सत्ता पाकर अहंकार में न आओ। जनता आपकी समर्थक हो या न हो उसकी बात आपको सुननी होगी। आप शाशक हैं तो उनके दुख दर्द में आपको भागी बनना ही होगा। हां एक बात जरूर यदि भाजपा इसे चेतावनी के रूप में नहीं लेती है तो आगे उसके लिए मुश्किलें बढ़ सकतीं हैं।
वैसे एक बात जरूर है कि कई तरह की अड़चनों , विरोध और प्रचार दुश्प्रचार के बावजूद भाजपा गुजरात में छठी बार सरकार बनाने में सफल रही। पिछले कार्यकाल के मुकाबले उसके सदस्यों की संख्या कम जरूर हुई पर चुनावी जंग में बाजी वही जितता है जो अधिक मेहनत करता है। तय है कि भाजपा ने अधिक मेहनत की और बाजी उसके हाथ लगी।
अब कांग्रेस यहां अपनी हार को नैतिक जीत बता रही है।  उसका दावा है कि गुजरात के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए बड़ा झटका है। पहली बात तो यह कि हार हार होती है। राजनीति खुद नीति है इसलिए नैतिक का मतलब क्या। कांग्रेस को माना पड़ेगा कि उसकी हार हुई है । उसने वह प्रयास नहीं किया जो कहीं जीत के लिए किया जाना चाहिए था। कांगेस अध्यक्ष का नैतिक जीत वाला बयान तो वैसा ही है जेसा कोई बच्चा  फेल होने के बाद यह गिनाना शुरू कर देता है कि उसके साथ पढ़ने वाले फलां फलां भी फेल हो गये है। 22 साल के सत्ता विरोधी लहर को ठीक से न भुना पाना कोंग्रेस की सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी रही। भाजपा की रणनीति के आगे उसके प्रयास छोटे हो गये और परिणाम कांग्रेस लोगों केगुस्से को अपनी जीत में न बदल सकी। यही नहीं गुजरात की बात और वहां नैतिक जीत की बात करने वाली कांग्रेस हिमाचल को भूल जाती है। चुनाव से पहले यहां कांग्रेस की सरकार थी। भाजपा तो गुजरात में अपनी 22 साल पुरानी सरकार बचाले गई पर कांग्रेस अपनी पांच साल पुरानी सरकार भी न बचा सकी। यही नहीं वहां तो उसके खेवनहार बीरभद्र सिंह ने पाटीं की हार के लए अपरोक्ष रूप से आलाकमान को जिम्मेदार ठहरा दिया। यहां कांग्रेस की नैतिकता कहां चली गई पता नहीं।
गुजतात और हिमाचल के परिणाम कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए सबक है। अब कौन इससे कितना सीखता है यह तो भविष्य के गर्भ में है।  हार को हार की तरह लेना बीरता होती है पर उसमें दूसरे की भी हार ढूंढना कायरता।

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