बुधवार, 22 मई 2024

आएगा तो मोदी ही।

 लोकसभा चुनाव 2024 के चार चरणों का चुनाव समाप्त हो चुका है 25 मैं को पांचवें चरण का भी चुनाव समाप्त हो जाएगा ।अब आम और खास में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है की क्या तीसरी बार भी नरेंद्र मोदी भाजपा और एनडीए की सरकार बनाने में सफल होंगे या फिर हिंदी गठबंधन उनकी राह में रोड़ा बनेगा। इन चरणों में मतदान को देखने के बाद मेरी यह समझ बनी है की 4 जून को एक बार फिर मोदी ही सबसे आगे रहेंगे । हालांकि इस बीच टूल किट और जॉर्ज सोरेस के चेलो ने विभिन्न सोशल मीडिया मंचों से  यह नॉरेटिव फैलाने का कुप्रयास किया किया कि मोदी जाने वाले हैं। 

लेकिन सच यह है की हौसलों की कभी हार नहीं होती ।73 वर्ष की उम्र में नरेंद्र मोदी तीसरी बखर  सत्ता में आने के लिए जो प्रयास कर रहे हैं वह दूसरे दलों के नेताओं के लिए अनुकरणीय है ।लोग तर्क दे रहे हैं कि उत्तर भारत में भाजपा संतृप्तता के लेवल तक पहुंच गई है अब इन इलाकों में उसे सीटों का घाटा उठाना पड़ सकता है। यह नॉरेटिव भी दगे कारतूस टाइप पत्रकार विभिन्न सोशल मीडिया से अपना पूरा दम लगाकर बनाने में जुटे हुए हैं। खुद दूसरों की गोद में बैठकर मेनस्ट्रीम की पत्रकारिता को गोदी मीडिया कहने वाले लोग 4 जून को हर हाल में मुंह की । खाएंगे मेरा अनुमान यह कहता है कि एनडीए को 363 सिम हर हाल में मिल रही हैं । इसलिए कोई कुछ भी कहे आएगा तो मोदी ही।

गुरुवार, 10 मार्च 2022

भाजपा अपने राज बचाने में सफल कांग्रेस की दुर्दशा

 आज पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आ गए। इनमें से उत्तर प्रदेश समेत 4 राज्यों को बचाने में भाजपा सफल रही है । पंजाब की जनता ने अलग खिचड़ी पकाई है और दिल खोल कर आम आदमी पार्टी को अपना समर्थन दिया है । वैसे तो राजनीतिक पंडित इन चुनावों में भाजपा के पक्ष में परिणाम को लेकर संशय में थे। उनका मानना था की के 4 राज्यों में एंटी इनकंबेंसी फैक्टर के कारण भाजपा को हार का रुख देखना पड़ सकता है। कोरोना काल की दुश्वारियां, बढ़ती बेरोजगारी आदि को केंद्र में रखकर राजनीतिक पंडित और पत्रकार इस तरह की राय रख रहे थे । लेकिन चुनाव परिणामों ने यह साबित किया देश में कमोबेश हर राज्य में मोदी का करिश्मा अभी बरकरार है । हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने मोदी की सभाओं में कम भीड़ को भाजपा के क्षरण का पैमाना बताना शुरू कर दिया था। लेकिन चुनाव परिणामों ने उनकी इन आशंकाओं को पूर्ण रूप से गलत साबित किया। सबसे पहले बात करते हैं उत्तर प्रदेश की यहां चुनाव की घोषणा से पूर्व ही लोग सपा को मुख्य संघर्ष वाली पार्टी मानकर चल रहे थे। दावा तो यहां तक किया जा रहा था की उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी। इसके पीछे युवाओं का आक्रोश , ब्राह्मणों की भाजपा से नाराजगी और भाजपा में रहे कुछ ओबीसी नेताओं का पार्टी छोड़कर सपा में शामिल होने को कारण बताया जा रहा था। शुरुआत में अखिलेश यादव और उनकी टीम जमीनी स्तर पर लड़ाई में दिखने भी लगी थी। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक कौशल और प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी का चेहरा और उनकी रणनीति सपा और गठजोड़ पर भारी पड़ी। अखिलेश यादव 2017 के भाजपा के ही प्रयोग को दोहरा कर उसे मात देना चाह रहे थे । लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो पाए,  हालांकि उनकी सीटें पिछले चुनाव के मुकाबले दोगुनी से अधिक जरूर हो गईं । इसके पीछे उनकी मेहनत कम और वर्तमान सरकार से नाराजगी का बड़ा हाथ रहा है । कुल मिलाकर जमीनी स्तर पर सुरक्षा का वातावरण कोरोना काल की दुश्वारियां से जूझ रहे गरीबों को मुफ्त राशन, ग्रामीण इलाकों में लोगों को पक्का मकान, उज्जवला योजना में गैस का चूल्हा, किसान निधि, श्रम सम्मान आदि एंटी इनकंबेंसी पर भारी पड़ा।  लगभग ढाई दशक बाद एक बार फिर भाजपा ने प्रदेश में जीत रखकर एक इतिहास रच दिया । इसके साथ ही ऐन चुनाव से ठीक पहले कृषि कानूनों की घोषणा भी भाजपा के लिए एक मास्टर स्ट्रोक साबित हुई। इस घोषणा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा और रालोद की धार को काफी हद तक कुंद कर दिया । रही सही कसर अखिलेश यादव और उनके साथियों के चुनावी कुबोल ने पूरा कर दिया।

 अब बात करते हैं उत्तराखंड की यहां चुनाव से 6 महीने पहले ही मुख्यमंत्री बनाए गए पुष्कर सिंह धामी अपना चुनाव जरूर हार गए पर उन्होंने पार्टी की संभावित हार को टालकर उत्तराखंड में भी दोबारा किसी एक दल की सरकार बनाने का बड़ा काम कर दिखाया। । हालांकि यहां भी मोदी का चेहरा ही भाजपा के सबसे अधिक काम आया। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी की जबरदस्त घेरेबंदी के बावजूद भारतीय जनता पार्टी इस प्रदेश में पूर्ण बहुमत से दोबारा सरकार बनाने में सफल रही है।  मणिपुर में भी दूसरे दूसरे दलों के दावों को झुठलाते हुए भाजपा लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफल रही है तो गोवा में भी विपक्ष के की जबरदस्त घेराबंदी के बावजूद भाजपा बहुमत के आंकड़े के आसपस पहुंच गई और इस प्रदेश में भी वह सरकार बना लेगी। इस तरह भाजपा ने अपने नेतृत्व वाले चार राज्य इन चुनाव में एक बार फिर बचा लिए । रही बात पंजाब की तो यहां कांग्रेस का अंतरकलह ,भाजपा अकाली दल का अलग होना, किसान आंदोलन का प्रभावी होना कांग्रेस अकली दल और भाजपा के लिए हार का कारण बना और आम आदमी पार्टी कि लोकलुभावन घोषणाएं घोषणा होने माउस की वहां उसकी जमीन तैयार की और उसकी झोली प्रचंड बहुमत से भर दिया सिद्धू का रवैया कांग्रेश के लिए काल मना सिद्धू तो चुनाव हारे कांग्रेस की लुटिया डुबो बैठे। यही आम आदमी पार्टी की इस प्रचंड लहर में लंबी श्री प्रकाश सिंह बादल को भी हार का सामना करना पड़ा। अब देखना यह है कि इस प्रचंड बहुमत को आम आदमी पार्टी आम आदमी पार्टी किस तरह से बचा कर रख पाती है और पंजाब को नशा बेरोजगारी और आतंक से मुक्त कर सकती है।

बुधवार, 2 मार्च 2022

आएंगे तो योगी ही

 चुनाव के पांच चरण समाप्त हो चुके हैं । कल यानी आज सुबह छठ में चरण का मतदान होना है।  बड़े बड़े बड़े राजनीतिक  पंडित और नामी-गिरामी पत्रकार इस चुनाव पर अपना अपना पक्ष किसी न किसी माध्यम से रख रहे हैं। एक पत्रकार के तौर पर मेरा आकलन यह कहता है की उत्तर प्रदेश में एक बार फिर भाजपा की ही सरकार बनेगी । हालांकि मुकाबला फिलहाल एक तरफा नहीं दिख रहा है। लेकिन यह तय है की भारतीय जनता पार्टी किसी भी हाल में 240 सीटों से कम पर नहीं रहेगी। यदि कानून व्यवस्था और दो वितरण ध्रुवीकरण का मंत्र काम कर गया तो भाजपा 2017 भी दोहरा सकती है । हालांकि विपक्ष जाने समाजवादी पार्टी राज्य में चुनाव के बाद अपनी सरकार बनाने का दावा काम तो कर कर रही है इसके पीछे सपा के पक्ष में मुस्लिम बिरादरी का आना एक बड़ा कारण माना जा रहा है। लेकिन उनकी एकजुटता भाजपा के लिए बहुमत का साधन बन सकती है पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों की नाराजगी और जाट मुस्लिम एकता के कारण भाजपा को पिछले चुनाव के मुकाबले कुछ घाटा हो सकता है। लेकिन उतना नहीं जितना विशेषज्ञ बता रहे हैं। दो चरणों तक सपा भाजपा के बराबर या उसे आगे रहने में सफल रही है पर तीसरे चरण के बाद भाजपा ने बढ़त हासिल शुरू की और यह बढ़त सातवें चरण तक भाजपा के पास ही रहेगी। 2017 के चुनाव में भाजपा प्रदेश में शिखर पर थी इसलिए यह तो तय है की वह वहां से कुछ नीचे आएगी ।अगर प्रदेश के युवाओं ने रोजगार की बात को लेकर सपा का साथ दिया तो भाजपा की सीटें वास्तव में कम हो सकती हैं । लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इस बार भाजपा दूसरे दलों के मुकाबले बढ़त पर दिख रही है। केवल मुस्लिम और यादों के बल पर सभा सपा किसी भी कीमत पर बहुमत नहीं पा सकती। भाजपा से टूट कर सपा में पहुंचे कई नेता तो अपनी सीट भी बचा पाएंगे या नहीं यह भविष्य के गर्भ में है।

शनिवार, 7 नवंबर 2020

नीतीश पर उन्ही के हथियार से वार

  15 वर्ष के विकास के दावे को एक 31-32 साल के नौजवान  ने  पूरी तरह धराशाई कर दिया।  नौजवान अपनी चुनावी सभाओं में लगातार विकास की पोल खोल तारा और वर्तमान सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं था। हालांकि 2015 में राजद के साथ जाकर नीतीश कुमार ने भी मोदी के खिलाफ यही हथियार उठाया था और भाजपा को मात देकर सफलता पाई थी । नीतीश के  इसी हथियार का उपयोग  5 साल बाद  तेजस्वी ने किया  और इसका परिणाम  10 नवंबर को आपके सामने होगा । हालांकि नीतीश से नाराज भाजपा का एक खेमा  अब  बिहार में भी एकला चलो की बात  कर सकता है । 

यही नहीं  35 साल के दूसरे नौजवान चिरागने तेजस्वी का भरपूर साथ दिया । भले लोजपा महागठबंधन में साझीदार नहीं था पर नीतीश कुमार  जैसे बड़े नेता  को  फिर  बिहार का मुख्यमंत्री न बनने देने को ही उसने अपना मूल एजेंडा बना लिया। वैसे  मतगणना से पहले  यह बात हो सकता है बेमानी लगे  पर  एग्जिट पोल के नतीजे अगर परिणाम में बदलते हैं  तो  नीतीश कुमार की हार का श्रेय  तेजस्वी और चिराग को ही जाएगा ।  हालांकि महागठबंधन का बेहतर समन्वय और एनडीए में अंतर्द्वंद भी इस करारी हार का एक कारण हो सकता है।  बिहार में  एनडीए नीतीश कुमार के नेतृत्व में  चुनाव लड़ रही थी  इसलिए उसकी दूसरी प्रमुख सहयोगी  भाजपा  भी  इस करारी हार का ठीकरा  नीतीश कुमार पर ही फोड़ेगी । बिहार मैं मतदाताओं ने अपनी राय ईवीएम मशीनों में अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को मत दे कर जता दिया है। इन मतों की गिनती का काम 10 नवंबर को पूरा होगा ।

शनिवार को चुनाव के अंतिम चरण के बाद एग्जिट पोल बिहार में एनडीए के हाथ से सत्ता छिटकते हुए दिखा रहे हैं, या फिर दोनों गठबंधनों में कड़े मुकाबले की बात कर रहे हैं। वैसे चुनाव में बिहार जीतने के लिए राजद और महागठबंधन इन दोनों ने अपनी तैयारी कर रखी लेकिन अगर लालू के लाल की सदारत में महागठबंधन राजग को इन चुनावों में पटखनी दे देता है तो यह तेजस्वी को बेहतर चुनाव प्रबंधन और लोगों की नब्ज समझने वाला नेता साबित करता है ।15 साल के सुशासन के दावे को केवल रोजगार का वादा करके इतनी बुरी तरह मात नहीं दिया जा सकता।

 महागठबंधन को मिलने वाले बड़े समर्थन के पीछे गठबंधन के सभी दलों की एकजुटता जमीन पर एक साथ काम करना और उनकी नीतियों में कोई भटकाव ना होना भी शामिल है। बड़ा दल हो या छोटा सब ने तेजस्वी को अपना नेता माना और राजग को मात देने में जी जान से जुट गए। दूसरी ओर राजग का चुनावी प्रबंधन किसी भी रूप में एकजुट नहीं रह सका दो प्रमुख दलों जदयू और भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच 2015 की खाई 2020 में भी पूरी तरह नहीं पट सकी। यही नहीं मुद्दों को लेकर भी इन दोनों दलों के बीच कई जगह मतभेद नजर आए। और तो और चुनावी सभाओं में एक दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं पर सहयोग ना करने की बात भी सार्वजनिक रूप से की गई । ऐसे में भला कोई जीत का दावा कैसे कर सकता है। अगर एग्जिट पोल के आंकड़े अंतिम परिणाम के रूप में सामने आते हैं तो इसका श्रेय केवल और केवल तेजस्वी यादव को दिया जाएगा ।तेजस्वी ने टिकटों के बंटवारे से लेकर सीट शेयरिंग तक के मामले को समय रहते ही सुलझा लिया। जबकि एनडीए में नामांकन के 2 दिन पहले तक वह बहुत असमंजस की स्थिति रही ।यही नहीं कई ऐसी सीटें भी जो भाजपा का गढ़ मानी जाती थी वह जदयू के खाते में गई परिणाम यह हुआ की उन विधानसभाओं के स्थानीय कार्यकर्ता जदयू की जगह किसी दूसरे दल के उम्मीदवार को अपनी पहली पसंद मानकर चलने लगे। रही सही कसर केंद्र में एनडीए की सहयोगी लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान ने पूरी कर दी । भले ही एग्जिट पोलों में उनकी पार्टी को कम सीटें दिखाई जा रही हो पर नीतीश कुमार की इतनी बड़ी हार का सबसे बड़ा कारण चिराग ही बने इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

जनता के मुद्दे पर चुनाव

  बिहार चुनाव का पहला चरण पूरा हो चुका है दूसरे चरण के लिए 3 नवंबर को मतदान होगा ।  प्रदेश के दोनों महत्वपूर्ण गठबंधन पहले चरण में अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। जनता ने किस को आशीर्वाद दिया यह तो 10 नवंबर को पता चलेगा लेकिन यह तय हो गया है बिहार में अब चुनावी मुद्दे तेजी से बदल रहे हैं । लोगों को रोजगार देने का दांव खेलकर  राजद के चुनावी कप्तान तेजस्वी ने एनडीए को गंभीर चुनौती दी तो भाजपा ने भी नौकरियों सहित 19 लाख रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की बात कहकर प्रदेश के युवा मतदाताओं को लुभाने की चाल चल दी ।  इस तरह की चुनाव में रोज मुद्दे बदल रहे हैं अब राजनीतिक दल नहीं बिहार में इस बार आम जनता चुनावी मुद्दा सेट करने में सबसे आगे है।

चुनावी समीकरणों की बात करें तो राजद प्रदेश भर में लालू यादव के पुराने माई समीकरण को साधने में जुटा हुआ है । कुछ हद तक उसे इस मामले में सफलता भी मिली है । हां सीमांचल इलाके में असदुद्दीन और पप्पू यादव की उपस्थिति राजद के समीकरण को अच्छी खासी प्रभावित कर सकती है । दूसरी ओर एनडीए के गठबंधन जदयू का सारा जोर महादलित और पिछड़े वर्ग पर है ।भारतीय जनता पार्टी अगड़ों समेत पिछड़ों को साधने में जुटी है ।अब यह तय हो चुका है कि बिहार में चुनाव तो विकास और रोजगार के मुद्दे पर ही प्रमुख रूप से लड़ा जाएगा। बावजूद इसके कई सीटों के परिणाम जातीय समीकरणों , विभिन्न दलों के बागियों और लोजपा,  रालोसपा , जाप तथा कुछ अन्य छोटे दलों द्वारा काटे गए वोटों पर भी निर्भर करेगा। 

हर दावे के बावजूद बिहार में हर सीट पर कांटे की टक्कर दिख रही हैं इसलिए चुनाव परिणाम  भी पुराने पूर्वानुमानोंं को ध्वस्त कर सकता है । जहां तक मतदाताओं की बात है तो पहले चरण में भी और उसके बाद के चरणों में भी लगभग 25 फ़ीसदी मतदाताओं ने किसको मत देना है यह निर्णय मतदान के दिन लिया। इसलिए उनके मन में क्या है यह तो वोट पड़ जाने के बाद ही पता चलेगा । मुझे 2015 का चुनाव याद आ रहा है इस चुनाव में भाजपा अपनी जीत के प्रति अति उत्साह में थी और उसका परिणाम सब ने देखा । इस बार भी राजद के कप्तान तेजस्वी अति उत्साह में है कहीं उनका भी हाल 2015 वाली भाजपा का ना हो जाए।

रविवार, 25 अक्टूबर 2020

चिराग की लौःः ताकत कहां से

 आज लोजपा प्रमुख चिराग पासवान बिहार चुनाव को लेकर 2 अहम बयान दिए हैं । पहला यह कि जहां लोजपा के उम्मीदवार नहीं है वहां उनके समर्थक भाजपा को वोट दें । दूसरा कि अगर उनकी सरकार बनी तो लोजपा नीतीश कुमार को जेल भेजेगी। उन्होंने खुलेआम आरोप लगाया कि नीतीश राज में बिहार में विकास नहीं भ्रष्टाचार हुआ है । अगर हम सरकार में आए तो इसकी जांच कराएंगे और नीतीश को जेल भेजेंगे । आखिर यह चिराग किसकी लौ से इतना फफक रहा है , उसके अंदर की कहानी क्या है आइए जानते हैं बाबा की जुबानी 

 यह तथ्य सही है कि बिहार में सभी मुद्दों पर इस समय एंटी इनकंबेंसी लहर पूरी भारी पड़ रही है । कोरोना काल के दौरान राज्य सरकार द्वारा बिहार के श्रमिकों को वापस बुलाने में की गई कोताही और इस दौरान आम लोगों को हुई असुविधा के कारण राज्य सरकार से लोगों की नाराजगी कुल मिलाकर लगभग हर जगह दिख रही है। यह बात अलग है कि यह नाराजगी एनडीए गठबंधन के विरोध में  मतदान केंद्रों पर निकलेगी या फिर केंद्र की मोदी सरकार द्वारा को रोना काल में दिए गए सहायता के कारण रुक जाएगी यह कहा नहीं जा सकता। चिराग और उनके सलाहकार इसी थ्योरी पर चुनाव प्रचार में जुटे हैं। उनके सलाहकारों का मानना है की राज्य सरकार ने कोरोन काल के दौरान लोगों के साथ सहानुभूति नहीं बरती और इसी नाराजगी को भुनाने के लिए चिराग प्रदेशभर का तूफानी दौरा कर रहे हैं । सड़क मार्ग से दौरा के बाद अब चिराग के लिए हेलीकॉप्टर की भी व्यवस्था कर ली गई है ताकि वह अधिक से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में अपनी बात लोगों के समक्ष रख सकते हैं।

 केवल चिराग ही नहीं राजद के नेतृत्व वाला महागठबंधन भी इस चुनाव में विकास को ही मुख्य मुद्दा बनाए रखना चाहता है ।हर जगह वह नीतीश सरकार को इसी मुद्दे पर घेरने की फिराक में है राजद और उसके सहयोगी दल स्थानीय स्तर पर मोदी के विरुद्ध कुछ ना बोल कर केवल नीतीश कुमार पर तीखा हमला बोल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध मोर्चा खोलने का काम इस गठबंधन में राहुल गांधी को दे रखा है। दूसरी ओर प्रगतिशील गठबंधन के साझीदार ओवैसी केंद्र पर हमला बोलकर केंद्र विरोधी वोट अपने खेमे में करने में जुटे हैं । ऐसे में चिराग को लगता है कि बस स्थानीय मुद्दों को उठाकर है चुनावी सफलता पाई जा सकती है । इसके साथ साथ भाजपा के नाराज  कार्यकर्ता और संघ के कुछ वर्ग का अंदरूनी समर्थन भी कि चिराग कौ मिलता दिख रहा है । जिसके कारण ही चिराग की लौ बिहार में तेजी पकड़ रही है। हालांकि 10 नवंबर को यह लौ कहां तक पहुंचेगी यह तो समय ही बताएगा। लेकिन इस चुनाव में तेजस्वी से अधिक राजग  खासकर नीतीश कुमार का नुकसान चिराग पासवान कर रहे हैं।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

किसको खाक करेंगे चिराग

 चिराग पासवान अपने चिराग से  किसका घर जलाएंगे किसका घर बचाएंगे अब लोगों की नजर  इस पर टिकी हुई है । यह भी संभव है  कि खुद जलकर  दूसरे को  खाक करने में चिराग सफल हो जाएंं  या फिर  खुद जल जाएंं  और उसकी लौ  दूसरे पर कुछ असर भी ना कर पाए । बिहार चुनाव पहले चरण का मतदान मैं 4 दिन का समय शेष रह गया है । दोनों गठबंधन अपना पूरा जोर मतदाताओं को रिझाने में लगा रहे हैं कुल मिलाकर लगता है कि यह चुनाव भी विकास के मुद्दे पर ही केंद्रित रहेगा । राजद की अगुवाई वाला गठबंधन नीतीश की अगुवाई वाले एनडीए को इसी विकास के मुद्दे पर घेरने में लगा है उसके तरकस में बेरोजगारी , पलायन , शिक्षा ,स्वास्थ्य आदि जैसे मुद्दे हैं। इसके जवाब में एनडीए पिछले 15 सालों में किए गए अपने विकास कार्यों को गिना रहा है ।और साथ ही साथ उसके पहले के 15 सालों में लालू प्रसाद के राज के दौरान बिहार की बिगड़ी हुई स्थिति की याद मतदाताओं को दिला रहा है । अब मतदाता कितना याद रखेंगे कितना नहीं या तो 28 अक्टूबर के पहले चरण के मतदान के दिन समझ में आएगा। इन सबके बावजूद तमाम विश्लेषक व बिहार की राजनीति के जानकार यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि एनडीए को जो भी घाटा होगा वाह नीतीश सरकार के एंटी इनकंबेंसी लहर के कारण संभव है । हालांकि चुनाव प्रचार में नरेंद्र मोदी के इंट्री इस लहर को कुछ हद तक रोकने में कामयाब हो सकती है । इसके साथ ही विभिन्न जनसभाओं में नितीश कुमार का छोटी-छोटी बातों पर झुझुलाना  इस बात की ओर संकेत करता है कि वह खुद अपने उपलब्धियों से पूरी तरह  मुतमइन नहीं है । इस तरह से छोटी-छोटी बातों पर मंच से जनता को जवाब देना कहीं उनके प्रत्याशियों पर भारी न पड़ जाए । एक और बाधा नीतीश की राह में खड़ी है वह है लोजपा के साथ जुड़े भाजपा के वैसे नेता जिनके संघ से गहरे संबंध रहे हैं। इन नेताओं के लिए खुले तौर पर ना सही लेकिन अंदरखाने संघ के लोग मैदान में लगे हुए हैं । वैसे भी लोजपा के अध्यक्ष चिराग पासवान ने एक मिशन बना लिया है कि उनका उद्देश्य केवल नीतीश कुमार को हराना है । अपनी चुनाव सभाओं में वह नीतीश कुमार पर काम ना करने का आरोप लगाते हैं । दूसरी ओर भाजपा के बारे में कुछ नहीं कहते हैं । इसका लाभ भाजपा को तो मिल सकता है लेकिन गठबंधन को को चिराग के इन बयानों से घाटा ही मिलेगा ।  अब चिराग अपने मकसद में कहां तक सफल होंगे यह निर्णय तो 10 नवंबर को परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा