रविवार, 13 जनवरी 2008
शुक्रवार, 11 जनवरी 2008
नारायण मूर्ति और हम
नतो चेहरे पर प्रसिद्धि का दंभ न ही बड़ा होने का अभिमान । ऐसा लगा जैसे हम उनसे मिलने नहीं गए थे बल्कि वी ही हमसे मिलने आयें हों । सहजता ऐसी कि पास आकर बैठते ही बोल पड़े भाई मेरा हिन्दी ग्रामर थोडा ठीक नहीं है , मैं हिन्दी समझ लूंगा पर बोलूँगा अंग्रेजी में ही। यही सहजता नारायण मूर्ति को हमसे , आपसे और आम आदमी से अलग करती है। बुलंदी की हर ऊंचाई पर करने के बाद भी नारायण मूर्ति की यह अदा हम लोगों को भा गई। दो दिन पहले प्रताप जी ने श्री मूर्ति से मिलने जाने की बात हमलोगों से बताई थी। आई आई टी कानपुर परिसर पहुँचने के थोडी के बाद आई आई टी कानपुर के कुछ adhikaariyon के साथ एक मुस्कुराता चेहरा हम लोगों के बीच था । जैसे ही प्रताप जी ने कहा मूर्ति साहब आपसे मिलने का एक सपना था जो मुद्दतों बाद पूरा हुआ इस पर नारायण मूर्ति ने जोर का ठहाका लगाया और कहा , इट्स माय प्लेजर । फिर उनसे अनौपचारिक बातें होतीं रही । खेल से लेकर दुनियादारी तक हर बात को उन्होने एक शिक्षक कि तरह समझया। बिना किसी लाग लपेट के कहा मैं अच्छा नही निष्पक्ष आदमी बनने मी विस्वास करता हूँ क्योंकि इससे हर समस्या का समाधान हो सकता है। उनहोंने साफ कहा निष्पक्षता से ही ख़ुशी पाई जा सकती है। जीवन का एक और मूलमंत्र उनहोंने बताया और कहा अपनी कमियों को दूर कर लीजिये हर क्षेत्र में आपको सफलता मिलेगी। गाँधी के अनन्य प्रशंसक श्री मूर्ति के अनुसार गाँधी बनिए आपको सम्मान खुदबखुद मिलेगा । सत्ता हमेशा आदमी को संकीर्ण बनती है। गाँधी के पास सत्ता का कोई पद नहीं था पर देश केलोगों का प्यार उनके पास था । इसी प्यार ने उनको महान बनाया । बातें ख़त्म हुईं और हम चलने को तैयार हुए श्री मूर्ति को भी लखनऊ निकलने कि जल्दी थी तभी उनकी नजर टेबल पर रक्खे काफी के कपों पर पड़ी और वह बोल पड़े अरे ह्वाट अबाउट काफ़ी और फिर एक कप उठाकर हमलोगों से कहा लेट अस फिनिश .
गुरुवार, 10 जनवरी 2008
घड़ी घडी क्यों
मैं bloging कि दुनिया में एकदम नया हूँ । मान लीजिये कि मैंने इस स्कूल की नर्सरी में प्रवेश लिया है । हालांकि कम्प्यूटर की दुनिया मेरे लिए ने नहीं है । जब कुरता पायजामा पहनता था तब भी कंप्यूटर के बारे में अपने समय के लोगों से अधिक जानता था । मैंने केवल कंप्यूटर पढ़ ही नही वरना पढाया भी । इसीलिए जबसे ब्लोगिंग के बारे में सुना इच्छा होती थी कि मैं भी अपना एक ब्लोग बनाऊं परन्तु काम की दुश्वारियों और समय के जबरन अभाव के कारण ऐसा नहीं कर पा रहा था । हाँ एक बात जरूर थी कि हर रोज दो चार ब्लोगों से रूबरू जरूर हो लेता था । इन्हीं की अछ्छाइयों और कुछ कमियों ने मुझे ब्लोगर बनने पर मजबूर कर दिया । अचानक एक दिन अपने संपादक प्रताप जी जो मुझे मित्रवत स्नेह देते हैं , से इसपर बात हुई और उनहोंने कहा तिवारी जी बनाइये और इसे गंभीर सूचनाओं के अदन प्रदान का एक अच्छा maadhyam बनाया जाएगा । बस क्या था मैं पिल पड़ा और हो गया ब्लोग का निर्माण । एक बार निर्णय लेने के बाद अपने सहयोगी सागर संजय पाटिल को इस काम में लगाया और एक अन्य सहयोगी शक्ति शर्मा की मदद से कुछ डिजाइन तैयार किया बाकी मदद प्रताप जी और मृतुन्जय ने की और मैं आपके सामने अपनी बात लेकर प्रस्तुत होने को तैयार हो गया । बस यही प्रयास होगा कि अपने बडों से जो शालीनता मिली है उसे इस ब्लोग के माध्यम से बरकरार रक्खा जाए । आज अभिब्यक्ति की आजादी के नाम पर जो कुछ किया जा रहा है वह मुझे रास नहीं अता । हो सकता है कई लोगों को यह बात पसंद न आये पर अपना भी एक अलग अंदाज है । कोशिश होगी कि इस ब्लोग में भी यह अंदाज बरकरार रहे ।
आपके सुझावों की प्रतीक्षा में
मनोज तिवारी बाबा
आपके सुझावों की प्रतीक्षा में
मनोज तिवारी बाबा
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