नतो चेहरे पर प्रसिद्धि का दंभ न ही बड़ा होने का अभिमान । ऐसा लगा जैसे हम उनसे मिलने नहीं गए थे बल्कि वी ही हमसे मिलने आयें हों । सहजता ऐसी कि पास आकर बैठते ही बोल पड़े भाई मेरा हिन्दी ग्रामर थोडा ठीक नहीं है , मैं हिन्दी समझ लूंगा पर बोलूँगा अंग्रेजी में ही। यही सहजता नारायण मूर्ति को हमसे , आपसे और आम आदमी से अलग करती है। बुलंदी की हर ऊंचाई पर करने के बाद भी नारायण मूर्ति की यह अदा हम लोगों को भा गई। दो दिन पहले प्रताप जी ने श्री मूर्ति से मिलने जाने की बात हमलोगों से बताई थी। आई आई टी कानपुर परिसर पहुँचने के थोडी के बाद आई आई टी कानपुर के कुछ adhikaariyon के साथ एक मुस्कुराता चेहरा हम लोगों के बीच था । जैसे ही प्रताप जी ने कहा मूर्ति साहब आपसे मिलने का एक सपना था जो मुद्दतों बाद पूरा हुआ इस पर नारायण मूर्ति ने जोर का ठहाका लगाया और कहा , इट्स माय प्लेजर । फिर उनसे अनौपचारिक बातें होतीं रही । खेल से लेकर दुनियादारी तक हर बात को उन्होने एक शिक्षक कि तरह समझया। बिना किसी लाग लपेट के कहा मैं अच्छा नही निष्पक्ष आदमी बनने मी विस्वास करता हूँ क्योंकि इससे हर समस्या का समाधान हो सकता है। उनहोंने साफ कहा निष्पक्षता से ही ख़ुशी पाई जा सकती है। जीवन का एक और मूलमंत्र उनहोंने बताया और कहा अपनी कमियों को दूर कर लीजिये हर क्षेत्र में आपको सफलता मिलेगी। गाँधी के अनन्य प्रशंसक श्री मूर्ति के अनुसार गाँधी बनिए आपको सम्मान खुदबखुद मिलेगा । सत्ता हमेशा आदमी को संकीर्ण बनती है। गाँधी के पास सत्ता का कोई पद नहीं था पर देश केलोगों का प्यार उनके पास था । इसी प्यार ने उनको महान बनाया । बातें ख़त्म हुईं और हम चलने को तैयार हुए श्री मूर्ति को भी लखनऊ निकलने कि जल्दी थी तभी उनकी नजर टेबल पर रक्खे काफी के कपों पर पड़ी और वह बोल पड़े अरे ह्वाट अबाउट काफ़ी और फिर एक कप उठाकर हमलोगों से कहा लेट अस फिनिश .


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें