समाचार उद्योग को अतुल जी जैसी सख्शियत फिर कब मिलेगी खुदा जाने । आना और जाना नेचर का नियम है । हम मानव इसे फिहाल रोक पाने में सक्षम नहीं हैं। असमय अतुल जी का जाना ऐसा लगा जैसे अपना कोई सरपरस्त बिन बताये चला गया । मेरी नजर में भाई साहेब का असमय जाना अख़बार जगत को और खुद मुझको एक बड़ा झटका है
समय न मिल पाने के कारण काफी अरसे से ब्लॉग पर कुछ लिख नहीं पा रहा था । पश्चिम की नक़ल में आगे निकल चुका अपना देश नए साल (एक जनवरी ) की खुमारी से उठा था कि आज अचानक दिन के १२ बजे के बाद एक दुखद समाचार मिला । कई sms और फ़ोन से एक दुखद सूचना मिली कि जी या अतुल भाई साहेब नहीं रहे khabar सुनते ही झटका सा लगा पर होनी को कौन टाल सकता है । लेकिन मैं आज जहाँ हूँ वहां तक पहुचने में एक योगदान अतुल भाई साहेब का भी है। बात १९९८ कि है तब मैं हिंदुस्तान पटना में था। अचानक एक दिन तब अमर उजाला कानपुर के संपादक प्रदीप जी के माध्यम से एक सूचना मिली कि तुम दिल्ली जाकर अतुल भाई साहेब से मिल लो। दिली जाने से पहले मैंने अतुल भाई साहेब से बात कि aur उन्होंने मुझे तीन दिन बाद का समय दिया । तीन दिन बाद मैं दिली पहुंचा और भाई साहेब से मिलने आश्रम स्थित उनके दफ्तर पंहुचा। संयोग से उस समय अतुल जी दफ्तर में नहीं थे। गर्द ने कहा भाई साहेब नहीं हैं आज मुलाकात नहीं होगी। फिर मैंने भाई साहेब के घर फ़ोन मिला दिया भाभी जी ने फ़ोन उठाया और कहा कि आप ऑफिस में बैठें भाई साहेब थोड़ी देर से वहां पहुचेंगें । मै इंतजार करने लगा और दो घंटे इंतजार के बाद भाई साहेब आये। पहली बार अख़बार के किसी मालिक से नौकरी के सिलसिले में मिल रहा था था वह भी उनके बुलावे पर। अन्दर से थोड़ी घबराहट थी लेकिन भाई साहेब के पहले वाक्य ने ही मेरा सारा भय दूर कर दिया । यार मनोज जी सॉरी आपको इंतजार करना पड़ा । इसके बाद मैं भाई साहेब के साथ उनके कमरे तक पंहुचा । और फिर जब बातों का सिलसिला सुरु हुआ तो तीन घंटे लग गए। नौकरी तो भाई साहेब ने पहले पांच मिनट में ही दे दी थी बाकी का समय देश के अख़बारों और ख़बरों पर बात होती रही । हालाँकि मैंने उस समय अमर उजाला ज्वाइन नहीं किया पर अब भाई साहेब को मना कैसे करूँ तब एक बार फिर प्रदीप जी ने उपाय बताया और कहा तुम अतुल जी को फ़ोन कर अपनी बात बता दो। मैंने भाई साहेब को फ़ोन किया और अपनी बात बताई तो उन्होंने कहा मनोज कोई बात नहीं हम फिर कभी साथ कम करेंगे और तुम बहुत आगे जाओगे कभी भी दिक्कत हो तो मुझसे मिलना। अतुल जी कि इस बात ने मेरे लिए प्रेरणा का कम किया । लगभग तीन घंटे तक अतुल जी से हुई बातचीत ने मेरे भीतर इतनी उर्जा भरी कि वह अज तक मेरे काम आती है। इसलिए मैं ताउम्र उनका ऋणी रहूँगा । वैसे भी अतुल जी जिस उम्र में सबको छोड़ कर गएँ हैं वह आज के जमाने में किसी के जाने का समय नहीं होता । अतुल जी को अपने अख़बार के लिए , समाज के लिए और पत्रकारों के लिए बहुत कुछ करना था पर कल के द्रूर हाथों ने उन्गें हमसे असमय छीन लिया । हर संसथान को अतुल जी जैसा अभिभावक मिले मेरी भगवन से यही प्रार्थना है। भगवन अतुल बहाई साहेब के परिजनों को यह दुख सहने कि शक्ति दें।
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