डरने की जरूरत नहीं
पिछले दो दिनों से शोसल मीडिया पर कुछ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मांगने वाले लोग फिर चिल्लाने लगे हैं। नया नारा है हम एबीवीपी से नहीं डरते। अरे भाई कौन कह रहा है कि आप डरो । जब आप को अपने मां-बाप से डर नहीं है तो फर एक संगठन से डरने की क्या जरूरत है। आप स्वतंत्र हैं स्वछंद है फर डर काहे का। हां अगर किसी को बदनाम करने का आपका यह अभियान है तो कोई बात नहीं । आप कहीं कुछ करे तो आजादी और दुसरा कुछ करे तो भय । यह नहीं चलेगा। अलोचना करिए तो आलोचना सहना भी सीखना होगा। अगर आईसा को बोलने की आजादी है तो यही आजादी एबीवीपी को भी होनी चाहिए। आप कहीं आंदोलन करे पुलिस का कानून ताड़े तो पुलिस को हक है कि वह बल प्रयोग करे। उससे बचना आपका काम है। क्योंकि अगर पुलिस वाले कार्रवाई नहीं करें तो भी गाज उन्हीं पर गिरेगी क्योकि आप तो देश को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
इसलिए हे विश्व में समाप्त हो रहे वामपंथ के पुजारियों इस देश में आपको कतई डरने की जरूरत नहीं है। इस देश की परंपरा बहुत ही सहनशील रही है। यहां देशद्रोही भी अभयदान पा सकता है। इसलिए डर का ढिंढोरा मत पीटिए और एक कारगिल शहीद को बदनाम न कीजिए क्योंकि आपके नारे सुनकर उसका बिलदान व्यर्थ हो जायेगा। उसकी आत्मा आको कोसेगी कि मैने ऐसे पुत्र या पुत्र को जन्म ही क्यो दिया जो अभिव्क्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश को बांटने वालों का समर्थन करे/करेगी।आप सड़को पर हल्ला करे तो यह लोतांत्रिक और एबीवीपी आपका विरोध करे तो यह अलोकतांत्रिक। यह दोरा मापदंड है यह बंद होना चाहिए। दादरी में अखलाख की हत्या हुई जो सर्वथा अनुचित थी । तब बड़े बड़ वामियें ने दनादन अपने पुरस्कार लौटाने की घेषणा कर डाली पर अभी हरल में तारेक फतेह पर हमला हुआ तो किसी ने चूं नहीं बोला, यह दोगलापन इस देश में नही चलेंगा। अगर इस तरह का दोगलापन होगा तो आपको डरना होगा । अगर आपके दूसरे की आलोचना को सहज में लें तब फिर आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है चाहे आपके चिता कारगिल शही हों या फिर एक मामूली नागरिक।
पिछले दो दिनों से शोसल मीडिया पर कुछ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मांगने वाले लोग फिर चिल्लाने लगे हैं। नया नारा है हम एबीवीपी से नहीं डरते। अरे भाई कौन कह रहा है कि आप डरो । जब आप को अपने मां-बाप से डर नहीं है तो फर एक संगठन से डरने की क्या जरूरत है। आप स्वतंत्र हैं स्वछंद है फर डर काहे का। हां अगर किसी को बदनाम करने का आपका यह अभियान है तो कोई बात नहीं । आप कहीं कुछ करे तो आजादी और दुसरा कुछ करे तो भय । यह नहीं चलेगा। अलोचना करिए तो आलोचना सहना भी सीखना होगा। अगर आईसा को बोलने की आजादी है तो यही आजादी एबीवीपी को भी होनी चाहिए। आप कहीं आंदोलन करे पुलिस का कानून ताड़े तो पुलिस को हक है कि वह बल प्रयोग करे। उससे बचना आपका काम है। क्योंकि अगर पुलिस वाले कार्रवाई नहीं करें तो भी गाज उन्हीं पर गिरेगी क्योकि आप तो देश को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
इसलिए हे विश्व में समाप्त हो रहे वामपंथ के पुजारियों इस देश में आपको कतई डरने की जरूरत नहीं है। इस देश की परंपरा बहुत ही सहनशील रही है। यहां देशद्रोही भी अभयदान पा सकता है। इसलिए डर का ढिंढोरा मत पीटिए और एक कारगिल शहीद को बदनाम न कीजिए क्योंकि आपके नारे सुनकर उसका बिलदान व्यर्थ हो जायेगा। उसकी आत्मा आको कोसेगी कि मैने ऐसे पुत्र या पुत्र को जन्म ही क्यो दिया जो अभिव्क्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश को बांटने वालों का समर्थन करे/करेगी।आप सड़को पर हल्ला करे तो यह लोतांत्रिक और एबीवीपी आपका विरोध करे तो यह अलोकतांत्रिक। यह दोरा मापदंड है यह बंद होना चाहिए। दादरी में अखलाख की हत्या हुई जो सर्वथा अनुचित थी । तब बड़े बड़ वामियें ने दनादन अपने पुरस्कार लौटाने की घेषणा कर डाली पर अभी हरल में तारेक फतेह पर हमला हुआ तो किसी ने चूं नहीं बोला, यह दोगलापन इस देश में नही चलेंगा। अगर इस तरह का दोगलापन होगा तो आपको डरना होगा । अगर आपके दूसरे की आलोचना को सहज में लें तब फिर आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है चाहे आपके चिता कारगिल शही हों या फिर एक मामूली नागरिक।


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें