रविवार, 17 मई 2009

बदलने का समय

१५ वीं लोकसभा के परिणाम आ चुके हैं । हर दल परिणामो की अपनी अपनी तरह से विश्लेषण करने में जुटे हैं। २००४ की करारी हार के बाद भी भाजपा ने कोई सबक नही लिया और अक बार फ़िर जनता को अपनी बात नहीं समझा पाई । पुरे चुनाव में भाजपा के पास न तो कोई अपना अजेंडा था न ही कोई दृष्टिकोण। बावजूद इसके वह केन्द्र में सरकार बनाने का सपना जरूर पाल बैठी । यही नहीं पार्टी में राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर संगठन में समन्वय और तालमेल का भारी अभाव रहा । टिकट वितरण से लेकर चुनावों तक हार स्तर पर पार्टी में कलह होता रहा । यह कलह छोटे नेताओं में नही बल्कि राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के बीच रही । खैर जो हुआ सो हुआ पर अब भाजपा को संभलना होगा । कुछ नहीं तो भाजपा के दिग्गज नौसिखिया कहे जाने वाले कांग्रेस के खेवनहार राहुल गाँधी से सबक लेकर पहले संगठन को ठीक करे । अनुशाशानाहीन नेताओं को चाहे वह कितना बड़ा क्यों न हो उसे बहार का रास्ता दिखाए और औरों से ख़ुद को अलग दिखने की पुराणी परम्परा पर कायम रहे । इसके साथ ही यदि उसे गठबंधन की राजनीती करनी है तो कुछ ऐसे विवादास्पद मुद्दौं को फिलहाल छोड़ दे जिनसे उनके सहयोगी भड़क सकते हैं और यदि उसे अपने एजेंडे का ही पालन करना है तो फ़िर वह गठजोड़ की राजनीती को अलविदा कह पूर्ण रूप से अपने एजेंडे पर चले। अन्यथा उसे देर सबेर बिहार में भी ओडिसा की तरह की समस्या का सामना करना पड़ेगा और नितिसकुमार भाजपा को बिहार में दूध की माखी की तरह निकल फेकेंगे ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें