राजनीति का चस्का कब पढ़ने लिखने में बदला पता ही नहीं चला। अब तो इसी में मन रम गया क्या कहूं रमा दिया गया। इसी से जीवन की गाड़ी चलने ही नहीं दौड़ने लगी। शैशव काल से ही शहर और कस्बे बदलते रहे पर मैं नहीं बदला। अब पढ़ने लिखने का काम चलता रहे इसके लिए ही आप सब से जुड़ना चाहता हूं। कहां का हूं इसे छोड़िए और मानिए बस आपका अपना हूं। यूं तो कहां कहां रहा अब मुझे भी याद नहीं है। बस देश का हूं और देसी हूं यही पहचान है मेरी और स्नेह करने वाले बाबा नाम से जानते हैं। मान लीजिए मैं भी एक यायावर हूं। पाकिस्तान के शायर मुनीर नियाजी का शेर जो शायद मेरे बारे में ही लिखा गया हैः
आदत ही बना ली है तुमने तो मुनीर अपनी
जिस शहर में भी रहना उकताये हुए रहना।
व्यक्तिगत विवरणः जन्मस्थान बलिया जिले का एक छोटा सा गांव
कर्म भूमि बिहार और झारखंड के कई शहर
धनबाद में बाल्यकाल और किशोरावस्था पटना में गुजारा। पढ़ाई के सिलसिले में बंगाल भी देखा।
इसके बाद शहर दर शहर बदलने का सिलसिला चल पड़ा। दिल्ली फिर बिहार होते हुए पंजाब पहुंचा। कुछ साल झारखंड में गुजारने के बाद अपने गृह
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