रविवार, 21 फ़रवरी 2016

बोलने की आज़ादी कितनी


करीब हफ्ते भर से देख रहा हूँ , सुन रहा हूँ और पढ़ रहा हूँ | बुद्धि के सोल ठेकेदार, बहुत सारे विद्वान गर्व से चिग्घाड़ रहे हैं हाँ हम देश द्रोही हैं| सरकारका दखल उनको खल रहा है| उनके बोलने की आज़ादी में बाधा आ रही है| जे एन यू प्रकरण में जिस बात पर बात होनी चाहिए वह पीछे छूट गई है| लोग एक दुसरे का इतिहास पूछने लगे हैं | कोई क़ुरबानी गिना रहा है तो कोई तुमने कितनी क़ुरबानी दी यह पूछ रहा है| कहाँ कहाँ तिरंगा फहराया जायेगा और कहाँ अब तक नहीं फहराया जाता है यह बहस का विषय बन गया है| बामी हों या दामी, आंग्रेस हो या कांग्रेस सब के सब अपनी राजनीती चमकाने मे यह भूल गएँ हैं की जेएनयू में लगा नारा चाहे वह जिस किसने लगाया हो गलत है| आप जितने भी तर्क गढ़ लें लेकिन " भारत तेरे टुकड़े होंगें" ऐसा नारा तो देश विरोधी ही लगा सकता है| और बोलने की आज़ादी के नाम पर इसका समर्थन भी कत्तई देशविरोधी ही कहा जायेगा | चाहे यह समर्थन राहुल गाँधी कर रहें हो चाहे नितीश कुमार या फिर सीताराम येचुरी या इतिहासकार इरफ़ान हबीब या पत्रकार रविश या राजदीप सरदेसाई , इन सबको देश को यह जबाव तो देना ही होगा की क्या "भारत तेरे टुकड़े होंगे " या "घर-घर से अफज़ल निकलेगा" जैसे नारे लगाने वाले क्या इस देश में रहने या यहाँ का अन्न जल ग्रहण करने की पात्रता रखते हैं| केवल विरोध के लिए विरोध करना है तो विरोध कीजिये पर उसमे देश को मत घसीटीये | हाँ एक बात और मैं बहुत बड़ा राष्ट्र भक्त हूँ इसके लिए सड़कों पर चिल्लाना या 270 फीट ऊँचा तिरंगा लेकर चलना जरूरी नहीं है| देश भक्ति दिल में रहती है और इसे दिखने के लिए सीना चीरने की जरूरत नहीं होती| यही नहीं कन्हैया हों या खालिद खुदा करें, भगवान करें ये वाकई देश द्रोही न साबित हों पर इन्हें ये सद्बुद्धि जरूर मिले की कोई भी इनके सामने ये कहने की हिम्मत नहीं कर सके कि "भारत तेरे टुकड़े होंगे"|
इनसे अधिक सद्बुद्धि की जरूरत उन कथित विद्वानों को है जो केवल विरोध के लिए हर चीज को जायज ठहराने में जुटें हैं| हे बुद्धि बेचकर अपना पेट चलाने वालों कम से कम इतना बेसरम मत होइए की बोलने की आज़ादी के नाम पर कोई कुछ भी बोल दे और आप तोप तलवार लेकर उसके समर्थन में सड़कों पर घोड़ों गदहों की तरह हिनहिनाना और फनफानना शुरू कर दें| कुछ तो मर्यादा रखिये देश का समाज का, कम से कम राजनीतिकों के सुर में सुर मिला कर उनके चारण और भाट तो मत बनिए| मनमोहन थी अभी मोदी हैं फिर कोई और आएगा पर देश वही रहेगा इसका तो ख्याल रखिये| वरना आने वाली पीढ़ी आपके साथ या मेरे साथ क्या करेगी यह तो भविष्य ही बताएगा | लेकिन भविष्य की भूमिका तय करने में आप के विचार सकारत्मक रहें या नकारात्मक यह तो आपको तय करना होगा|

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