चिल्लाते रहो
फिर चिल्लाने लगे हैं चिल्लाने वाले | तर्क सुनने की क्षमता समाप्त हो गयी | अब जगह जगह से प्रमाणपत्र लेकर खुद किसी को निर्दोष और किसी को दोषी साबित करने में जुट गए हैं| संसद से सड़क तक बस हम अपनी कहेंगे दुसरे की सुनेंगे नहीं | ठीक भी है कोई करे क्या | कहीं चुनाव होने वाला है तो कहीं चुनाव की डुगडुगी लगभग बज चुकी है | सबको अपने समीकरण की चिंता है| बेकार की बातों पर बहस कर जनता के कर की कमाई लुटाई जा रही है| सवाल पूछे जाते हैं और जब जबाव की बारी आती है तब सबको मिर्च लगने लगती है | संविधान की किताब खोल नियम कायदे दिखाए जाते हैं | जबाव गलत है| एक "धर्मनिरपेक्ष" देश में ऐसी बातें नहीं की जा सकतीं हैं | यह अलग बात है की ऐसी बात करने वालों के समर्थन में कहीं भी जाकर बैठा जा सकता है उन्हें उकसाया जा सकता है| उस समय संविधान के ये जानकार नियम उपनियम सब भूल जाते हैं| चुनाव होता है तो हर दल को हर जाति धर्म के लोगों का वोट चाहिए होता है| नेता सबके हाथ पावं जोड़ता नजर अता है पर संसद पहुंचाते ही सब कुछ भूल विशुद्ध जातिवादी हो जाता है|
सोशल मीडिया नाम के हथियार काजमकर सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों हो रहा है| हर को अपनी बात कहने की आज़ादी है होनी भी चाहिए | जिसको जितना कहना है कहे पर उस कहे की जिम्मेवारी भी ले | वही बात संविधान में प्रदत्त अधिकार तो हर किसी को चाहिए पर उसमे उल्ल्लिखित कर्तव्य करने को कोई तैयार नहीं है | अगर मेरी जानकारी सही है तो हॉल के सबसे चर्चित दो मामले अदालतों में या जाँच प्रक्रिया के अधीन है| बावजूद इसके कथित बुद्धिजीवी इन दोनों मामलों पर रोज फैसला सुना रहे हैं| कोई टीवी चैनलों पर बैठ कर तो कोई फेसबुक या ट्विटर पर लिखकर| मूर्खों को इतना भी धैर्य नहीं की जाँच तक इंतजार
कर सकें|
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