गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

चलो अधिकार तो मिला



लंदन
से एक खबर हिंदू धर्म के पक्के अनुयायी देवेंदर ने खुले में अंतिम संस्कार के लिए कानूनी जंग जीत ली है। 71 साल के हिंदू को कोर्ट ऑफ अपील ने उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप यह इजाजत दी है। साथ ही यह कह दिया है कि इसके लिए कानून में किसी बदलाव की जरूरत नहीं है। यह फैसला ब्रिटेन में रहने वाले 5 लाख 60 हजार हिंदुओं के लिए नजीर बन सकता है। देवेंद्र ने कोर्ट की यह बात मान ली है कि चिता के चारों तरफ दीवार तथा खुली छत हो। हाईकोर्ट ने पिछले साल मई में देवेंद्र को उनकी अंतिम इच्छा के तौर पर चिता पर जलाए जाने की इजाजत देने से मना कर दिया था क्योंकि ब्रिटिश कानून किसी भी मानव अवशेष को खुले में जलाए जाने की इजाजत नहीं देता।पर उपदेश कुशल बहुतेरे की लीक पर चलने वाले ब्रिटेन में पिछले कई सालों से एक हिन्दू अपने अंतिम संस्कार को सनातन तरीके से करने की लड़ाई लड़ रहा था पर ब्रिटिश कानून उसकी अंतिम इच्छा पूरी करने में सहायक नहीं हो रहा था । पर देवेन्दर की मेहनत रंग ली और निशिंत होकर अंतिम साँस ले सकेगा। भारत , भारतीयता और यहाँ के सबसे प्राचीन जीवन पद्धति सनातन मत या आधुनिक काल में हिन्दू धर्मावलम्बियों को सांप्रदायिक कहने वालों ऑंखें खोलो और देखो कौन साम्प्रदायिक है और कौन निरपेक्ष । यह सर्व विदित है की भारत में आदिकाल से सभी मतों मसलन ईसाई, मुस्लिम, पारसी या अन्य के लोग नहीं रहा करते थे । कोई SARNARTHI बन कर आया तो कोई लुटेरा तो कोई व्यापर के बहाने यहाँ आया और उसमे अधिकतर यहीं के हो के रह गए। गिरिजा बना , मस्जिदें बनी पर यहाँ किसी को अपने धर्म के मुताबिक आचरण करने से नहीं रोका गया । जन्म से लेकर मृत्यु तक में होने वाले संस्कारों को अपने धर्म और मत के अनुसार करने की छूट दी गई। अगर आपसी वैमनस्य की बात छोड़ दें तो शायद ही भारत में किसी राजशक्ति ने कब्रगाहों पर रोक लगाई हो। धर्म जिसका मेरी नजर में अर्थ सार्वजनिक जीवन में आपका व्यवहार है , वास्तव में इसका सम्पूर्ण रूप प्राचीन काल से लेकर अबतक केवल और केवल भारत में ही देखने को मिलता है। हिन्दू पादशाही के संस्थापक मने जाने वाले शिवाजी के राज में भी इसी धर्म का बखूबी पालन हुआ । लेकिन खुद को निरपेक्ष कहे जाने वाले मतावलंबियों के राज में एक मनुष्य को अपना धार्मिक अधिकार पाने के लिए कोर्ट का सहारा लेना पड़ता है। कई ऐसे देश हैं जहाँ आप को अपने इश्वर को पूजने का सार्वजनिक अधिकार नहीं है जबकि वहां का राजधर्म और उसका साहित्य यह प्रचारित करता है की हम किसी दुसरे धर्मं के विरोधी नहीं हैं छोटी छोटी बैटन पर मानवाधिकार की बात करने वाले देशों को अपना मानवाधिकार तो याद रहता है पर दूसरों को मानवाधिकार उनके गले नहीं उतरता है। खैर देवेंदर की लड़ाई काम आई और ब्रिटेन में रहने वाले भारतवंशियों के परिजनों को उनकी अस्थियाँ अब गंगा यमुना में प्रवाहित करने का मौका मिल सकेगा।

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