गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

गैर संवैधानिक हावी क्यों



लगता है अब भारत में जिसकी लाठी उसकी भैंस का तंत्र चल रहा है। ६० साल क गणतंत्र अब वाकई बूढ़ा हो गया है तभी तो इस गणतंत्र के गणपति खुद को संविधान से ऊपर मानने लगे हैं । अगर गंभीरता से सोचें तो आज़ादी और संविधान अंगीकार करने के बाद तथा उससे पहले भी देश में कई गैर संवैधानिक लोगो की हनक सवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से अधिक रही है। रजा रजवाड़ों के समय यह ताकत उनके मुह्नलागों के पास होती थी तो बाद में यह शक्ति कुछ एक प्रभावशाली लोगो के पास सिमित हो गई । ऐसी स्थिति में गणपति बहुमत के नाम पर तानाशाह की तरह व्यवहार करने लगे । देश क हर वह आदमी जो सांसद, या मंत्री बनाने की योग्यता रखता है यह जनता है की यह पूरा देश उसका है । उसे कहीं भी जा कर रहने कमाने और वहां क निवासी होने का हक़ हासिल है। (कांग्रेस की कृपा से जम्मू कश्मीर को छोड़कर )। लेकिन कुछ काठ के उल्लू जो किसी न किसी तरीके से आम आदमी की भावनाएं भड़काकर गणपति बन बैठे हैं देश के संविधान की मूल भावना को ही तिलांजलि देने में लगे हैं। हद तो तब हो जाती है की ऐसे जहर उगलने वालों पर संविधान के पैरोकार भी कोई कार्रवाई नहीं कर पाते है , कारण बस यह की अगर कार्रवाई कर दी तो अगली बार सत्ता के खेल में उसे घटा उठाना पद सकता है। हर जगह बहस चल पड़ी है मुंबई किसके बाप की । अखबार तो अपनी मर्यादा क पालन करते हुए इस मुद्दे पर सन्देश देने क प्रयास कर रहे हैं। लेकिन टीवी चैनल इस मुद्दे पर लाइव बहस कराकर ऐसे मुद्दे उठाने वालों को ही प्रश्रय दे रहें हैं। टीवी पर आने के बाद हर पत्रकार बहुत बड़ा विद्वान और नेता अपने को सबसे बड़ा रहनुमा समझाने लगता है। इन वोट के सौदागरों को अपने को बहुत बड़ा विद्वान समझाने वाला एंकर या पत्रकार तथ्यों के साथ बात नहीं कर पता है (कुछ को छोड़कर ) . इसका परिणाम यह होता है की बहस बतंगड़ में तब्दील हो जाती है और इसका कोई तार्किक परिणाम नहीं निकालता है। चलिए अब थोड़ी बात कर ली जाय देश को चलने वालों की। मुंबई में ठाकरे परिवार एक स्वर से गरजता है मुंबई केवल मराठियों की लेकिन देश की सत्ता से जुदा कोई उनका प्रतिकार नहीं करता । प्रधानमंत्री चुप रहते हैं । गृह मंत्री क मुह कई दिन बाद खुलता है वह भी तब जब कांग्रेस के बाबा राहुल इस मसले पर जुबान खोलते है । मनमोहन जी , चिदंबरम जी राहुल बाबा से पहले तो आपकी जुबान खुलनी चाहिए थी लेकिन आप चुप थे इसका जवाब मुबई ही नहीं पुरे देश को चाहिए । वह तो बिहार में पार्टी के बिखरे जनाधार को जोड़ने के लिए राहुल बाबा की मजबूरी थी कि वो ऐसा बयां दें पर जनाब यह तो एक राजनितिक बयान है । अगर ऐसा नहीं है तो छोड़ दीजिये प्रधान मंत्री क पद और सौंप दीजिये राहुल बाबा को गद्दी । और अगर ऐसा नहीं है तो कम से कम अपने पर गैर संवैधानिक शक्ति को राज न करने दीजिये। क्रमशः ,,,,,

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