शनिवार, 13 फ़रवरी 2010
मंशा ठीक रहे तो---
मैं अमूमन फ़िल्में नहीं देखता उनके रिव्यू अखबारों या पत्रिकाओं में पढ़ लेता हूँ। पिछले कई दिनों से शाहरुख़ खान के एक फिल्म की चर्चा है। क्या टीवी क्या अखबार हर जगह बस उसी की बात हो रही है। किसी भी घटना के होने के बाद अक्सर देर से पहुँचाने वाली पुलिस इस बार न जाने क्यों मुंबई में इतनी मुस्तैद दिखी समझ में नहीं आई। ११ और १२ फ़रवरी को लगा टीवी चैनल वालों के पास कोई दूसरी खबर ही नहीं है । केवल खान उनकी फिल्म और ठाकरे बस यही इन दोनों दिन खबरों की बिषय वस्तु रहे। ना जाने क्यों खबरचियों ने मुंबई को ठाकरे की बाप का जागीर मन लिया । केवल खबरची ही क्यों वहां की सरकार को भी शायद ऐसा लगा मनो अगर खान भाई की फिल्म १२ फ़रवरी को रिलीज नहीं होगी तो उनकी सरकार गिर जाएगी और मुंबई सचमुच ठाकरे के बाप दादाओं की हो जाएगी । प्राकृतिक और अन्य आपदाओं में अमूमन एक दो दिन बाद जागने वाली अफसरशाही इस मामले में ना जानें क्यों पहले से ही जग गई । केवल एक फिल्म को रिलीज करवाने के लिए और इसके रिलीज में कोई खलल ना पड़े केंद्रीय गृह सचिव साहब भी राज्य सर्कार को निर्देश देने लगे । हे सचिव साहब नंदीग्राम में जब बवाल हो रहा था तब आप ने कितने दिन बाद और कितनी बार राज्य सर्कार को वहां हिंसा रोकने का निर्देश दिया । झारखण्ड, ओरिसा , बिहार , बंगाल और अन्य कई राज्यों में चल रहे नक्सली उत्पात पर आपने कितन बार राज्य सरकारों को दिशा निर्देश दिया। ऐसा लगता है अब केंद्र के अफसर तंत्र को आम आदमी की पीड़ा से कुछ लेना देना नहीं है। अगर सरकारों का ध्यान अपनी ओर खींचना है तो आपको सेलिब्रेटी बनाना पड़ेगा वरना भुगते रहिये । क्योंकि आपसे तो इनके आकाओं का सबका अब जा चुनाव होंगें तभी पड़ेगा तब तक आपकी आवाज इनके कानों तक नहीं पहुचेगी । अब आप ही बताएं ४० हजार और ६० हजार फ़ोर्स लगाकर एक सिनेमा रिलीज कराया जा रहा है। अरे अगर महाराष्ट्र की सर्कार को यही लगता था की शिवसेना का यह विरोध अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रा पर हमला है तो क्यों नहीं वह बाल ठाकरे , उद्धव आदि को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया । लेकिन शायद प्रदेश सरकार की भी मंशा ठीक नहीं थी क्योंकि अगर वह इनको जेल में डालती तो उसक मराठी वोट बैंक बिगड़ जाता । इस तरह टिकट खरीदवा कर , फ़ोर्स लगवा कर महारास्त्र की सरकार ने एक तीर से दो निशाना साधा है । पहला मुस्लिम वोट बैंक को और पक्का किया और दूसरा कांग्रेस आलाकमान को भी खुश कर दिया । शाहरूख से आलाकमान की निकटता के बारे में कुछ ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है। अब थोडा इससे आगे बढ़ाते हैं फिल्म रिलीज होने के बाद चैनलों पर जिस तरह से शारूख की बीरगाथा और ठाकरे की पराजय का डंका पीटा जाने लगा क्या यह मुंबई में भड़की आग में घी का कम नहीं करेगा । अरे भाई आग पर पानी डालिए घी डाल कर उसे भडकाइये नहीं । ठाकरे जैसे अलगाव की बात करने वाले समय की भेंट चढ़ जायेंगे। कृपया एक सिनेमा के चक्कर में पूरे देश का भविष्य बर्बाद ना कीजिये । विरोधी को विरोध का अधिकार दीजिये पर एक दायरे में और किसी का समर्थन कीजिये तो वह भी एक दायरे में ही ठीक लगता है। इसलिए जिसको फिल्म देखना है उसे शांति से देखने दीजिये और जिसे नहीं देखना है उसे भी शांतिपूर्ण विरोध करने दीजिये । पर हे सरकार और उसके कारिंदों आप इसमें पार्टी न बनिए।
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आप ठीक कह रहे हैं सर। अगर देखा जाए तो यहां न तो किसी को शाहरुख खान से कुछ लेना है और न ही किसी को महाराष्टï्र की चिंता है। सब अपने बारे में सोच रहे हैं। आपने वोट बैंक केबारे में सोच रहे हैं। केंद्र सरकार आस्ट्रेलिया में नस्लीय हमले पर तो चिंता जता देती है, लेकिन अपने देश में फैलाए जा रहे नस्लीय जहर का कोई इलाज नहीं खोज रही है। एक बार सीने में हौसले की हवा तो भरिए, फिर देखिए ये ठाकरे वाकरे क्या चीज है।
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