कब तक छलोगे मेरे भाई
आज लगभग एक साल बाद ब्लॉग खोला। अखिलेश के फोन के बाद सोचा कुछ लिख ही दूं। 2 0 1 4 चुनाव सर पर हैं। हर दल अपनी डफली अपना राग अलापने में लगा है। हर किसी को अपनी कमीज दूसरे के कमीज से अच्छी लग रही है। अपनी कमीज का कालर तो दीखता नहीं है पर दूसरे के कमीज कि कालर हर कोई उलट उलट कर देखने को बेक़रार है . वैसे आजकल हम भारत के लोग सोशल भी हो गए है. कोई फेसियता है तो कोई ट्विटियता है पर बिना सर पैर के। कहीं खड़े होकर किसी को कुछ बोल दो किसी कि दीवाल पर कुछ भी लिख दो . जिसको मिर्ची लगती है वह चिचियाने लगता है और बाकी मौज लेते हैं। ज्यादा मौज लेना हो तो उसे अगरसरित कर और मौज ले लियय जाता है। न तो किसी के मान से मतलब नहीं किसी के मर्यादा से। हाँ जब बात अपने पर आती है तो हर चीज गलत दिखने लगती है . गांधी जी ने कहा था बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो। बुरा मत बोलो। हम सब इसे मानते तो हैं पर पहला अपने लिए और दू सरा तीसरा दूसरों के लिए। अपने लिए बुराई सुनने को कोई तैयार नहीं है दूसरे कि बुराइ देखने को हर कोई तैयार है रही बोलने कि बात तो यह कहने कि जरूरत नहीं है।
जहाँ देखिये हर कोई दूसरे पर पिला पडा है। दूसरों के लिए हम कुंडली विशेषज्ञ हो गए हैं। दूसरों कि वंशावली लेकर हर कोई खड़ा है अपने बारे में पूछो तो टपक जबाब मिलता है आप कौन होते हैं हमारे बारे में पूछने वाले। बड़े मियां तो बड़े मियां छोटे मियां सुभान अल्ला। बस हैम और आप दिल थम कर बैठें और चुनाव संपन्न होने तक सबकी हकीकत से दूसरों के माध्यम से रु ब रु होते रहें। मतदाता हैं हम कोई कुछ भी कहे हमेशा छाला जाना ही हम लोगों के भाग्य में बदा है। हर कोई चुनाव पूर्व वादा करता है। निभाने कि कसम भी खता है पर जब निभाने का वक्त आता है तब वह हम लोगों को नियम कानून बताने लगता है। अरे भाई जब नियम कानून ही बताना था तो फिर नियम पढ कर वादा किया होता। हे गण के पतियों कब तक हैम यूँ ही छले जाते रहेंगे।
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